बृंदावन क्यों न भए हम मोर

परमानंददास

Pada 1

बृंदावन क्यों न भए हम मोर। करत निवास गोबरधन ऊपर, निरखत नंद किशोर। क्यों न भये बंसी कुल सजनी, अधर पीवत घनघोर। क्यों न भए गुंजा बन बेली, रहत स्याम जू की ओर॥ क्यों न भए मकराकृत कुण्डल, स्याम श्रवण झकझोर। 'परमानंद दास' को ठाकुर, गोपिन के चितचोर॥
कौन रसिक है इन बातन कौ