Bhagavad Gita · Chapter 18 · Verse 41

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।।18.41।।
brāhmaṇa-kṣhatriya-viśhāṁ śhūdrāṇāṁ cha parantapa karmāṇi pravibhaktāni svabhāva-prabhavair guṇaiḥ
साधक संजीवनी — स्वामी रामसुखदास
।।18.41।। व्याख्या --   ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप -- यहाँ ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्य -- इन तीनोंके लिये एक पद और शूद्रोंके लिये अलग एक पद देनेका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण? क्षत्रिय और वैश्य -- ये द्विजाति हैं और शूद्र द्विजाति नहीं है। इसलिये इनके कर्मोंका विभाग अलगअलग है और कर्मोंके अनुसार शास्त्रीय अधिकार भी अलगअलग है।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः -- मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है? उसके अन्तःकरणमें उस कर्मके संस्कार पड़ते हैं और उन संस्कारोंके अनुसार उसका स्वभाव बनता है। इस प्रकार पहलेके अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंके अनुसार मनुष्यका जैसा स्वभाव होता है? उसीके अनुसार उसमें सत्त्व? रज और तम -- तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न होती है। इन गुणवृत्तियोंके तारतम्यके अनुसार ही ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके कर्मोंका विभाग किया गया है (गीता 4। 13)। कारण कि मनुष्यमें जैसी गुणवृत्तियाँ होती हैं? वैसा ही वह कर्म करता है।विशेष बात(1) कर्म दो तरहके होते हैं -- (1) जन्मारम्भक कर्म और (2) भोगदायक कर्म। जिन कर्मोंसे ऊँचनीच योनियोंमें जन्म होता है? वे जन्मारम्भक कर्म कहलाते हैं और जिन कर्मोंसे सुखदुःखका भोग होता है? वे भोगदायक कर्म कहलाते हैं। भोगदायक कर्म अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको पैदा करते हैं? जिसको गीतामें अनिष्ट? इष्ट और मिश्र नामसे कहा गया है (18। 12)।गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो मात्र कर्म भोगदायक होते हैं अर्थात् जन्मारम्भक कर्मोंसे भी भोग होता है और भोगदायक कर्मोंसे भी भोग होता है। जैसे? जिसका उत्तम कुलमें जन्म होता है? उसका आदर होता है? सत्कार होता है और जिसका नीच कुलमें जन्म होता है? उसका निरादर होता है? तिरस्कार होता है। ऐसे ही अनुकूल परिस्थितिवालेका आदर होता है और प्रतिकूल परिस्थितिवालेका निरादर होता है। तात्पर्य है कि आदर और निरादररूपसे भोग तो जन्मारम्भक और भोगदायक -- दोनों कर्मोंका होता है। परन्तु जन्मारम्भक कर्मोंसे जो जन्म होता है? उसमें आदरनिरादररूप भोग गौण होता है क्योंकि आदरनिरादर कभीकभी हुआ करते हैं? हरदम नहीं हुआ करते और भोगदायक कर्मोंसे जो अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आती है? उसमें परिस्थितिका भोग मुख्य होता है क्योंकि परिस्थिति हरदम आती रहती है।भोगदायक कर्मोंका सदुपयोगदुरुपयोग करनेमें मनुष्यमात्र स्वतन्त्र है अर्थात् वह अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिसे सुखीदुःखी भी हो सकता है और उसको साधनसामग्री भी बना सकता है। जो अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिसे सुखीदुःखी होते हैं? वे मूर्ख होते हैं और जो उसको साधनसामग्री बनाते हैं? वे बुद्धिमान् साधक होते हैं। कारण कि मनुष्यजन्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है अतः इसमें जो भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आती है? वह सब साधनसामग्री ही है।अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको साधनसामग्री बनाना क्या है अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो उसको दूसरोंकी सेवामें? दूसरोंके सुखआराममें लगा दे? और प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग कर दे। दूसरोंकी सेवा करना और सुखेच्छाका त्याग करना -- ये दोनों साधन हैं।(2) शास्त्रोंमें आता है कि पुण्योंकी अधिकता होनेसे जीव स्वर्गमें जाता है और पापोंकी अधिकता होनेसे नरकोंमें जाता है तथा पुण्यपाप समान होनेसे मनुष्य बनता है। इस दृष्टिसे किसी भी वर्ण? आश्रम? देश? वेश आदिका कोई भी मनुष्य सर्वथा पुण्यात्मा या पापात्मा नहीं हो सकता।पुण्यपाप समान होनेपर जो मनुष्य बनता है? उसमें भी अगर देखा जाय तो पुण्यपापोंका तारतम्य रहता है अर्थात् किसीके पुण्य अधिक होते हैं और किसीके पाप अधिक होते हैं (टिप्पणी प0 927)। ऐसे ही गुणोंका विभाग भी है। कुल मिलाकर सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ऊर्ध्वलोकमें जाते हैं? रजोगुणकी प्रधानतावाले मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोकमें आते हैं? और तमोगुणकी प्रधानतावाले अधोगतिमें जाते हैं। इन तीनोंमें भी गुणोंके तारतम्यसे अनेक तरहके भेद होते हैं।सत्त्वगुणकी प्रधानतासे ब्राह्मण? रजोगुणकी प्रधानता और सत्त्वगुणकी गौणतासे क्षत्रिय? रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणतासे वैश्य तथा तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्र होता है। यह तो सामान्य रीतिसे गुणोंकी बात बतायी। अब इनके अवान्तर तारतम्यका विचार करते हैं -- रजोगुणप्रधान मनुष्योंमें सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ब्राह्मण हुए। इन ब्राह्मणोंमें भी जन्मके भेदसे ऊँचनीच ब्राह्मण माने जाते हैं और परिस्थितिरूपसे कर्मोंका फल भी कई तरहका आता है अर्थात् सब ब्राह्मणोंकी एक समान अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति नहीं आती। इस दृष्टिसे ब्राह्मणयोनिमें भी तीनों गुण मानने पड़ेंगे। ऐसे ही क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र भी जन्मसे ऊँचनीच माने जाते हैं और अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति भी कई तरहकी आती है। इसलिये गीतामें कहा गया है कि तीनों लोकोंमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है? जो तीनों गुणोंसे रहित हो (18। 40)।अब जो मनुष्येतर योनिवाले पशुपक्षी आदि हैं? उनमें भी ऊँचनीच माने जाते हैं जैसे गाय आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कुत्ता? गधा? सूअर आदि नीच माने जाते हैं। कबूतर आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कौआ? चील आदि नीच माने जाते हैं। इन सबको अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति भी एक समान नहीं मिलती। तात्पर्य है कि ऊर्ध्वगति? मध्यगति और अधोगतिवालोंमें भी कई तरहके जातिभेद और परिस्थितिभेद होते हैं। सम्बन्ध --   अब भगवान् ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
Sri Anandgiri
।।18.41।।प्रकरणार्थमुपसंहृतमनुवदति -- सर्व इति। तस्यानेकात्मकत्वेन हेयत्वं सूचयति -- क्रियेति। निर्गुणादात्मनो वैलक्षण्याच्च तस्य हेयतेत्याह -- सत्त्वेति। अनर्थत्वाच्च तस्य त्याज्यत्वमनर्थत्वं चाविद्याकल्पितत्वेनावस्तुनो वस्तुवद्भानादित्याह -- अविद्येति। न केवलमष्टादशे संसारो दर्शितः? किंतु पञ्चदशेपीत्याह -- वृक्षेति। चकारादुक्तः संसार इत्यनुकृष्यते। संसारध्वस्तिसाधनं सम्यग्ज्ञानं च तत्रैवोक्तमित्याह -- असङ्गेति। वृत्तमनूद्यानन्तरसंदर्भतात्पर्यमाह -- तत्र चेति। उक्तो निवर्तयिषितः संसारः सतिसप्तम्या परामृश्यते? सर्वो हि संसारो गुणत्रयात्मकः। नच गुणानां प्रकृत्यात्मकानां संसारकारणीभूतानां निवृत्तिर्युक्ता प्रकृतेर्नित्यत्वादित्याशङ्कायां स्वधर्मानुष्ठानात्तत्त्वज्ञानोत्पत्त्या गुणानामज्ञानात्मकानां निवृत्तिर्यथा भवति तथा स्वधर्मजातं वक्तव्यमित्युत्तरग्रन्थप्रवृत्तिरित्यर्थः। तत्तद्वर्णप्रयुक्तधर्मजातानुपदेशे चोपसंहारप्रकरणप्रकोपः स्यादित्याह -- सर्वश्चेति। उपसंहृते गीताशास्त्रार्थे यद्यपि सर्वो वेदार्थः स्मृत्यर्थश्च सर्व उपसंहृतस्तथापि मुमुक्षुभिरनुष्ठेयमस्ति वक्तव्यमवशिष्टमित्याशङ्क्याह -- एतावानिति। अनुष्ठेयपरिमाणनिर्धारणवदुक्तशङ्कानिवर्तनं शास्त्रार्थोपसंहारश्चेत्येतदुभयं चकारार्थः। संप्रतिवर्णचतुष्टयस्यानुष्ठेयं धर्मजातं संकीर्णमिति सूत्रमुपन्यस्यति -- ब्राह्मणेति। उपनयनसंस्कारवत्त्वे सति वेदाधिकारित्वं समानमिति त्रयाणां समासकरणम्। इतरेषामसमासे हेतुमाह -- शूद्राणामिति। एकजातित्वमुपनयनवर्जितत्वं कर्मणामसंकीर्णत्वेन व्यवस्थापकं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति -- केनेत्यादिना। स्वभावप्रभवैर्गुणैरित्यस्यार्थान्तरमाह -- अथवेति। उक्तव्यवस्थायां कार्यदर्शनं प्रमाणयति -- प्रशान्तीति। स्वभावशब्दस्यार्थान्तरमाह -- अथवेति। किमिति गुणाभिव्यक्तेरुक्तवासनाधीनत्वं तत्राह -- गुणेति। ननु नास्ति गुणप्रादुर्भावस्य निष्कारणत्वं प्रकृतिजैर्गुणैरिति प्रकृतेर्गुणकारणत्वाभिधानादत आह -- स्वभाव इति। वासनाकारणमिति गुणव्यक्तेर्निमित्तकारणत्वं विवक्षितं प्रकृतिस्तूपादानमिति भावः। उक्तमुपसंहरति -- एवमिति। स्वभावप्रभवैः सत्त्वादिगुणैर्ब्राह्मणादीनां कर्माणि प्रविभक्तानीत्युक्तमाक्षिपति -- नन्विति। शास्त्रस्य धर्मविभागहेतोः सत्त्वादिविशेषापेक्षयैव विभागज्ञापकत्वादुभयत्र विभागहेतुत्वोक्तिरविरुद्धेति परिहरति -- नैष दोष इति।
Sri Dhanpati
।।18.41।।एवं क्रियादिलक्षणस्य संसारस्य त्रिगुणात्मकत्वप्रतिपादकेन प्रकरणेन चतुर्दशसप्तदशाध्यायोक्तोऽर्थ उपसंहृतः चोर्ध्वमूलमधःशाखमित्यादिनाऽविद्यापरिकल्पितं संसारं वृक्षरुपेणाभिधायअसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा। ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः इत्यसङ्गस्त्रेण विषयवैराग्येण तस्य छेदनं कृत्वा परमात्मान्वेष्टव्य इत्युक्तम्। तत्र सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्वे त्रिगुणात्मकस्य संसारवृक्षस्य कथं छेदोऽसङ्गशस्त्रस्यैवानुपपत्तेरित्याशङ्कायां स्वस्वाधिकारविहितैर्वर्णाश्रमधर्मैः परितोष्यमाणात्परमेश्वरादसङ्गशस्त्रलाभ इति वदितुमेतावानेव सर्ववेदार्थः परमपुरुषार्थमिच्छद्भिननुष्ठेय इति च गीताशास्त्रार्थ उपसंहर्तव्य इत्येवमर्थमुत्तरं प्रकरणमारभ्यते। तत्रेदं सूत्रम् -- त्रयाणां समासकरणं द्विजत्वेन वेदाध्ययनादितुल्यधर्मत्वकथनार्थम्। शूद्राणामिति पृथक्करणमेकजातित्वेन वेदानधिकारित्वज्ञापनार्थम्। तथाच वसिष्ठःचत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रास्तेषां त्रयो त्वाचार्य उच्यते इति। तथा प्रतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्य स्थाननिशेषाच्चब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहूराजन्यः कृतः। ऊरु तदस्य यद्वैश्यः पध्भां सूद्रो अजायत र्दिशति। शूद्राणां च कर्माणि शमदमादीनि प्रविभक्तानि इतरेतविभागेन व्यवस्थितानि। कैरित्यपेक्षायामाह -- स्वभावप्रभवैर्गुणैः ईश्वरस्य त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः स्वभावः स प्रभवः कारणं येषां तैर्गुणैः। यद्वा स्वभावस्य प्रभवास्तैस्तथाच ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुणः प्रभवः कारणं? तथा क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रजः प्रभवः? वैश्यस्वभावस्य तमउपसर्जनं रजः प्रभवः? शूद्रस्वभावस्य रजउपसर्जनं तमः प्रभवः। शान्त्यैश्वर्येहामूढस्वभावदर्शनाच्चतुर्णाम्। अथवा जन्मान्तरकृतसंस्कारः प्राणिनां वर्तमानजन्मनि स्वकार्याभिमुखत्वेनाभिव्यक्तः स्वभावः स प्रभवो येषां तैः प्रकृत्युद्वोधितैर्गुणैः स्वकार्यानुरुप्येण ब्राह्मणादीनां शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि शास्त्रेणापि ब्राह्मणादीनां सत्त्वादिगुणविशेषापेक्षयैव शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि नतु गुणानपेक्षयेति शास्त्रविभक्तान्यपि तानि गुणविभक्तान्युच्यन्ते। क्षत्रियस्वभावजं शत्रुतापनरुपं कर्म त्यक्तुमशक्यमङगीकर्तुं योग्योऽसीति सूचयति परंतपेति संबोधनेन।
Sri Madhavacharya
।।18.41।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
Sri Neelkanth
।।18.41।।एवं पञ्चदशे संसाराश्वत्थमसङ्गशस्त्रेण च्छित्त्वा परं पदं परिमार्गितव्यमित्युक्तं तत्रात्मनोऽसङ्गत्वोपपादनाय क्रियाकारकफललक्षणस्य कृत्स्नस्य संसारस्य त्रिगुणात्मकत्वमुक्तम्। नह्यात्मानात्मनोर्गुणातीतगुणात्मकयोः सङ्गः संभवति। नह्याकाशान्तर्वर्तिपृथिव्यादिगुणेन गन्धादिनाकाशः संसृज्यते तद्वदित्युक्तम्। समाप्तः शास्त्रार्थः। अथेदानीं सर्वगीताशास्त्रार्थमुपसंहर्तुमसङ्गशस्त्राप्त्युपायं च प्रदर्शयितुं प्रकरणान्तरमारभते -- ब्राह्मणेत्यादिना। शूद्राणामसमासकरणं वेदानधिकारात्। प्रविभक्तानि असंकीर्णानि। तत्र हेतुमाह स्वभावप्रभवैर्गुणैः। स्वभाव ईश्वरस्य प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका सैव प्रभवो हेतुर्येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवास्तैः। यद्वा ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुण एव प्रभवः शान्तत्वात्। क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रजः ईश्वरस्वभावत्वात्। वैश्यस्वभावस्य तम उपसर्जनं रजः कृष्यादिस्वभावत्वात्। शूद्रस्वभावस्य रज उपसर्जनं तमः शुश्रूषास्वभावत्वात्। अथवा स्वभावः प्राग्भवीयः संस्कारस्तत्प्रभवैर्न तु जातिमात्रप्रभवैः पक्षिणामाकाशगमनवत्। अतएव जात्यन्तरव्यावृत्तानां धर्माणां शमादिषु पाठो न दृश्यते। नहि शूद्राद्व्यावृत्तं,त्रैवर्णिकानामध्ययनादिकं वा इतरद्वयाद्व्यावृत्तं ब्राह्मणानामध्यापनादिकं वा इह पठ्यते। किंतु सर्वे सर्वजातीयानां साधारणा धर्माः शमादयो दृश्यन्ते। यथाहि द्रोणादिषु ब्राह्मणेष्वपि शौर्यादिकं भरतादिषु क्षत्रियेष्वपि शमादिकं दृष्टम् एवमितरत्र। तस्माद्यस्मिन्कस्मिंश्चिद्वर्णे शमादयो दृश्यन्ते स शूद्रोऽप्येतैर्लक्षणैर्ब्राह्मण एव ज्ञातव्यः। यत्र च ब्राह्मणेऽपि शूद्रधर्मा दृश्यन्ते स शूद्र एव। तथा चारण्यके सर्पभूतं नहुषं प्रति युधिष्ठिरवाक्यम्सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो घृणा। दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृतः। तथायत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः। यत्रैतन्न भवेत्सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत् इति। जातिधर्मास्तु मनुना दर्शिताःअध्यापनं चाध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्। प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिं च क्षत्रियस्य समासतः। पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च। एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्। एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया। इति। तस्मात् शमादयो यत्राब्राह्मणे ब्राह्मणे वा दृश्यन्ते स एव ब्राह्मण इत्यत्र विवक्षितम्।स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः इत्यत्र तु मनूक्तान्यध्यापनादीन्येव स्वकर्माणि ग्राह्याणि न तु शमदमादीनि। नहि ज्ञानविज्ञानवतोऽन्या संसिद्धिर्लब्धव्यास्ति। तस्माच्छमदमादयो ब्रह्मिष्ठस्यैव ब्राह्मणस्य लक्षणमिति दिक्।
Sri Ramanujacharya
।।18.41।।ब्राह्मणक्षत्रियविशां स्वकीयो भावः स्वभावः ब्रह्मणादिजन्महेतुभूतं प्राचीनं कर्म इत्यर्थः। तत्प्रभवाः सत्त्वादयो गुणाः ब्राह्मणस्य स्वभावप्रभवो रजस्तमोऽभिभवेन उद्भूतः सत्त्वगुणः? क्षत्रियस्य स्वभावप्रभवः सत्त्वतमसोः अभिभवेन उद्भूतो रजोगुणः? वैश्यस्य स्वभावप्रभवः सत्त्वरजोऽभिभवेन अल्पोद्रिक्तः तमोगुणः? शूद्रस्य स्वभावप्रभवः तु रजःसत्त्वाभिभवेन अत्युद्रिक्तः तमोगुणः। एभिः स्वभावप्रभवैः गुणैः सह प्रविभक्तानि कर्माणि शास्त्रैः प्रतिपादितानि। ब्राह्मणादय एवंगुणकाः तेषां च तानि कर्माणि वृत्तयः च एता इति हि विभज्य प्रतिपादयन्ति शास्त्राणि।
Sri Sridhara Swami
।।18.41।।ननु च यद्येवं सर्वमपि क्रियाकारकफलादिकं प्राणिजातं च त्रिगुणात्मकमेव कथं तर्ह्यस्य मोक्ष इत्यपेक्षायां स्वस्वाधिकारविहितैः कर्मभिः परमेश्वराराधनात्तत्प्रसादलब्धज्ञानेनेत्येवं सर्वगीतार्थसारं संगृह्य प्रदर्शयितुं प्रकरणान्तरमारभते -- ब्राह्मणेत्यादि यावदध्यायसमाप्ति। हे परंतप शत्रुतापन? ब्राह्मणानां क्षत्रियाणां विशां च शूद्राणां च कर्माणि प्रविभक्तानि प्रकर्षेण विभागतो विहितानि। शूद्राणां स्वभावात्पृथक्करणं द्विजत्वाभावेन वैलक्षण्यात्। विभागोपलक्षणमाह -- स्वभावः सात्त्विकादिः प्रभवति प्रादुर्भवति येभ्यस्तैर्गुणैरुपलक्षणभूतैः। यद्वा स्वभावः पूर्वजन्मसंस्कारस्तस्मात्प्रादुर्भूतैरित्यर्थः। तत्र सत्त्वप्रधाना ब्राह्मणाः? सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानाः क्षत्रियाः? तमउपसर्जनरजःप्रधाना वैश्याः? रजउपसर्जनतमःप्रधानाः शूद्राः।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
।।18.41।।एवं सर्वेषां संसारिणां गुणत्रयवश्यत्वमुक्तम् अथ तत्तद्गुणतारतम्यवद्देहयोगिनामधिकारिणां यथाधिकारं शास्त्रैर्विभक्तानि कर्मादीनि विविच्यन्ते। तस्य परमप्रस्तुतेन सङ्गत्यर्थमध्यायारम्भप्रक्रान्तं प्रदर्शयति -- त्यागेनेत्यादिना।सन्न्यासशब्दार्थादनन्य इति -- श्रुतावपि हि त्यागेनैके [महाना.8।14कैवल्यो.2] सन्न्यास योगात् [मुण्डको.3।2।6] इत्युभावेकविषयाविति भावःएवम्भूतस्येति -- त्रिविधत्यागयुक्तस्येत्यर्थः।वृत्त्या सहेति कृषिगोरक्ष्यादीनि हि वक्ष्यमाणानि [18।44] जीविकाविशेषा इति भावः।अत्रब्राह्मणक्षत्ित्रयविशाम् इति समासो द्विजत्वे सति वेदाधिकारात्। प्राचीनकर्मानुरूपं सत्त्वादिगुणवृद्धिः प्रागेव प्रपञ्चिता? अतस्तद्धेतुकं कर्मात्र तत्तद्गुणप्रचुरपुरुषासाधारणधर्मतया स्वभाव इति दर्शितम्। एतेनकर्मवश्या गुणा ह्येते सत्त्वाद्याः पृथिवीपते [वि.पु.1] इति वचनादौपाधिकानां गुणानां चात्र स्वाभाविकतोक्तिशङ्काऽपि निरस्ता। गुणविभागप्रकारो ब्राह्मपुराणादिषु प्रपञ्चितः। तस्यायं सङ्क्षेपः -- तमः शूद्रे रजः क्षत्त्रे ब्राह्मणे सत्त्वमुत्तमम् इति। अस्यार्थं वदन्प्रकृतं विवृणोति -- रजस्तमोभिभवेनोद्भूतः सत्त्वगुण इति। उत्तमशब्दस्यरजः क्षत्त्रे इत्यादिष्वप्यन्वयमाहक्षत्ित्रयस्येत्यादिना।अल्पोद्रिक्त इति शूद्राद्व्यवच्छेदाय। अतीन्द्रियाणां गुणानामपि शास्त्राधीनविभागत्वात्कर्मप्रविभागे गुणानां कर्तृत्वाद्यसम्भवाच्चगुणैः सहेत्युक्तम्। गुणापेक्षया शास्त्रेण विभक्ततया गुणप्रविभक्तत्वोपचारादयमेवार्थ उचित इति भावः। कैर्विभक्तानीति शङ्कायांशास्त्रैरिति शेषपूरणम्। स्वरूपविभागस्य शास्त्राधीनत्वाभावादसङ्कीर्णबोधनं विवक्षितमित्याह -- प्रतिपादितानीति। विभज्य प्रतिपादनं विवृणोति -- ब्राह्मणादय इति। कर्मशब्द एव सामान्यतो वृत्तिमपि संगृह्णाति? तादर्थ्याद्वा तदाक्षेप इत्यभिप्रायेणाऽऽहवृत्तयश्चेति। जीवनोपाया इत्यर्थः।
Sri Abhinavgupta
।।18.41 -- 18.60।।एवमियता षण्णां प्रत्येकं त्रिस्वरूपत्वं धृत्यादीनां च प्रतिपादितम्। तन्मध्यात् सात्त्विके राशौ वर्तमानो दैवीं संपदं प्राप्त इह ज्ञाने योग्यः? त्वं च तथाविधः इत्यर्जुनः प्रोत्साहितः।अधुना तु इदमुच्यते -- यदि तावदनया ज्ञानबुद्ध्या कर्मणि भवान् प्रवर्तते तदा स्वधर्मप्रवृत्त्या विज्ञानपूततया च न कर्मसंबन्धस्तव। अथैतन्नानुमन्यसे? तदवश्यं तव प्रवृत्त्या तावत् भाव्यम् जातेरेव तथाभावे स्थितत्वात्। यतः सर्वः स्वभावनियतः ( S??N स्वस्वभावनियतः ) कुतश्चिद्दोषात् तिरोहिततत्स्वभावः ( S??N -- हिततत्तत्स्वभावः ) कंचित्कालं भूत्वापि? तत्तिरोधायकविगमे स्वभावं व्यक्त्यापन्नं लभत एव। तथाहि एवंविधो वर्णनां स्वभावः। एवमवश्यंभाविन्यां प्रवृत्तौ ततः फलविभागिता भवेत्।।तदाह -- ब्राह्मणेत्यादि अवशोऽपि तत् इत्यन्तम्। ब्राह्मणादीनां कर्मप्रविभागनिरूपणस्य स्वभावोऽश्यं नातिक्रामति,( S? ? N omit न and read अतिक्रामति ) इति क्षत्रियस्वभावस्य भवतोऽनिच्छतोऽपि प्रकृतिः स्वभावाख्या नियोक्तृताम् अव्यभिचारेण भजते। केवलं तया नियुक्तस्य पुण्यपापसंबन्धः। अतः मदभिहितविज्ञानप्रमाणपुरःसरीकारेण कर्माण्यनुतिष्ठ। तथा सति बन्धो निवर्त्स्यति। इत्यस्यार्थस्य परिकरघटनतात्पर्यं ( S? ? N -- करबन्धघटन -- ) महावाक्यार्थस्य। अवान्तरवाक्यानां स्पष्टा ( ष्टोऽ ) र्थः।समासेन ( S omits समासेन ) ( श्लो. 50 ) संक्षेपेण। ज्ञानस्य? प्रागुक्तस्य। निष्ठां ( ष्ठा ) वाग्जालपरिहारेण निश्चितामाह। बुद्ध्या विशुद्धया इत्यादि सर्वमेतत् व्याख्यातप्रायमिति न पुनरायस्यते,( N -- रारभ्यते )।
Sri Jayatritha
।।18.41।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
Sri Madhusudan Saraswati
।।18.41।।तदेवं सत्त्वरजस्तमोगुणात्मकः क्रियाकारकफललक्षणः सर्वः संसारो मिथ्याज्ञानकल्पितोऽनर्थश्चतुर्दशाध्यायोक्त उपसंहृतः। पञ्चदशे च वृक्षरूपककल्पनया तमुक्त्वाअश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा। ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः इत्यसङ्गशस्त्रेण विषयवैराग्येण तस्य छेदनं कृत्वा परमात्मान्वेष्टव्य इत्युक्तं? तत्र सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्वे त्रिगुणात्मकस्य संसारवृक्षस्य कथं छेदोऽसङ्गशस्त्रस्यैवानुपपत्तेरित्याशङ्कायां स्वस्वाधिकारविहितैर्वर्णाश्रमधर्मैः परितोष्यमाणात्परमेश्वरादसङ्गशस्त्रलाभ इति वदितुमेतावानेव सर्ववेदार्थः परमपुरुषार्थमिच्छद्भिरनुष्ठेय इति च गीताशास्त्रार्थ उपसंहर्तव्य इत्येवमर्थमुत्तरं प्रकरणमारभ्यते। तत्रेदं सूत्रम् -- ब्राह्मणेति। त्रयाणां समासकरणं द्विजत्वेन वेदाध्ययनादितुल्यधर्मत्वकथनार्थम्। शूद्राणामिति पृथक्करणमेकजातित्वेन वेदानधिकारित्वज्ञानपनार्थम्। तथाच वसिष्ठःचत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रास्तेषां त्रयो वर्णा द्विजातयो ब्राह्मणक्षत्रियवैश्याः तेषांमातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जीबन्धने। अत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते इति। तथा प्रतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्यं स्थानविशेषाच्चब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहूराजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत इत्यपि निगमो भवतिगायत्र्या ब्राह्मणमसृजत त्रिष्टुभा राजन्यं जगत्या वैश्यं न केनचिच्छन्दसा शूद्रमित्यसंस्कारो विज्ञायते इतिशूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिः इति च गौतमः। हे परन्तप शत्रुतापन? तेषां चतुर्णामपि वर्णानां कर्माणि प्रकर्षेण विभक्तानीतरेतरविभागेन व्यवस्थितानि। कैः स्वभावप्रभवैर्गुणैर्ब्राह्मण्यादिस्वभावस्य प्रभवैर्हेतुभूतैर्गुणैः सत्त्वादिभिः। तथाहि ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुण एव प्रभवः प्रशान्तत्वात्। क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रज ईश्वरभावात्। वैश्यस्वभावस्य तमउपसर्जनं रज ईहास्वभावत्वात्। शूद्रस्वभावस्य रजउपसर्जनं तमो मूढस्वभावत्वात्। अथवा मायाख्या प्रकृतिः स्वभावस्तत उपादानात्प्रभवो येषां तैः। प्राग्भवीयः संस्कारो वर्तमाने भवे स्वफलाभिमुखत्वेनाभिव्यक्तः स्वभावः स निमित्तत्वेन प्रभवो येषामिति वा। शास्त्रस्यापि पुरुषस्वभावसापेक्षत्वाच्छास्त्रेण प्रविभक्तान्यपि गुणैः प्रविभक्तानीत्युच्यन्ते।आख्यातानामर्थं बोधयतामधिकारिशक्तिः सहकारिणी इति न्यायात्। तथाहि गौतमःद्विजातीनामध्ययनमिज्या दानं ब्राह्मणस्याधिकाः प्रवचनयाजनप्रतिग्रहाः। पूर्वेषु नियमस्तु राज्ञोऽधिकं रक्षणं सर्वभूतानां न्याय्यदण्डत्वं? वैश्यस्याधिकं कृषिवणिक्पाशुपाल्यं कुसीदं च? शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिस्तस्यापि सत्यं कामः अक्रोधः शौचमाचमनार्थे पाणिपादप्रक्षालनमेवैके श्राद्धकर्म भृत्यभरणं स्वदारवृत्तिः परिचर्योत्तरेषामिति। अत्र साधारणा असाधारणाश्च धर्मा उक्ताः। पूर्वेष्वध्ययनेज्यादानेषु नियमोऽवश्यकर्तव्यत्वं नतु प्रवचनयाजनप्रतिग्रहेषु वृत्त्यर्थत्वादित्यर्थः। वणिक् वाणिज्यं? कुसीदं वृद्ध्यै धनप्रयोगः? उत्तरेषामिति श्रेष्ठानां द्विजातीनामित्यर्थः। वसिष्ठोऽपिषट्कर्माणि ब्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यज्ञो याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेति? त्रीणि राजन्यस्याध्ययनं यज्ञो दानं च शस्त्रेण च प्रजापालनं स्वधर्मस्तेन जीवेत्। एतान्येव त्रीणि वैश्यस्य कृषिर्वणिक्पाशुपाल्यं कुसीदं,च। तेषां परिचर्या शूद्रस्येति। आपस्तम्बोऽपिचत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रास्तेषां पूर्वः पूर्वो जन्मतः श्रेयान् स्वकर्म ब्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यज्ञो याजनं दानं प्रतिग्रहणं दायाद्यं शिलोञ्छाद्यन्यच्चाप्यपरिगृहीतमेतान्येव। क्षत्रियस्याध्यापनयाजनप्रतिग्रहणानीति परिहाय युद्धदण्डादिकानि। क्षत्रियवत् वैश्यस्य दण्डयुद्धवर्जं कृषिगोरक्षवाणिज्याधिकं? परिचर्या शूद्रस्येतरेषां वर्णानाम् इति। मनुरपिअध्यापनं चाध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्।।प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिं च क्षत्रियस्य समादिशत्।।पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव व। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च। एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्। एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूया।। इति। एवं चतुर्णामपि वर्णानां गुणभेदेन कर्माणि प्रविभक्तानि।
Sri Purushottamji
।।18.41।।नन्वेवं चेत्सर्वं त्रिगुणात्मकमेव तदा गुणात्मकस्य जीवस्य त्रिगुणात्मकबन्धकक्रियादिकरणात् कथं मोक्षः इत्याशङ्क्य शास्त्रद्वारा जीवोद्धारं कर्तुं शास्त्रस्वरूप ज्ञानार्थं प्रसङ्गादर्जुनाय गीतामाहात्म्यतः पूर्वोक्तमुपसंहरन् मोक्षप्रकरणमारभते -- ब्राह्मणेत्यादि यावदध्यायसमाप्ति। हे परन्तप परमुत्कृष्टं तपो यस्येत्यनेन श्रवणयोग्यतोक्ता। ब्राह्मणक्षत्ित्रयविशां त्रैवर्णिकानां च पुनः शूद्राणां -- वेदानधिकृतत्वाछूद्राणां भिन्नतया कथनम् -- स्वभावः स्वस्य मम यो भावः सात्त्विकादिभेदेन विचित्रदर्शनेच्छा तेन प्रभव उत्पत्तिर्येषां तैरेतादृशैर्गुणैः कर्माणि प्रविभक्तानि प्रकर्षेण विभागतः सात्त्विकादेर्विहितानीत्यर्थः।
Sri Shankaracharya
।।18.41।। --,ब्राह्मणाश्च क्षत्रियाश्च विशश्च ब्राह्मणक्षत्रियविशः? तेषां ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च -- शूद्राणाम् असमासकरणम् एकजातित्वे सति वेदानधिकारात् -- हे परंतप? कर्माणि प्रविभक्तानि इतरेतरविभागेन व्यवस्थापितानि। केन स्वभावप्रभवैः गुणैः? स्वभावः ईश्वरस्य प्रकृतिः त्रिगुणात्मिका माया सा प्रभवः येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवाः? तैः? शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि ब्राह्मणादीनाम्। अथवा ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुणः प्रभवः कारणम्? तथा क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रजः प्रभवः? वैश्यस्वभावस्य तमउपसर्जनं रजः प्रभवः? शूद्रस्वभावस्य रजउपसर्जनं तमः प्रभवः? प्रशान्त्यैश्वर्येहामूढतास्वभावदर्शनात् चतुर्णाम्। अथवा? जन्मान्तरकृतसंस्कारः प्राणिनां वर्तमानजन्मनि स्वकार्याभिमुखत्वेन अभिव्यक्तः स्वभावः? सः प्रभवो येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवाः गुणाः गुणप्रादुर्भावस्य निष्कारणत्वानुपपत्तेः। स्वभावः कारणम् इति च कारणविशेषोपादानम्। एवं स्वभावप्रभवैः प्रकृतिभवैः सत्त्वरजस्तमोभिः गुणैः स्वकार्यानुरूपेण शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि।।ननु शास्त्रप्रविभक्तानि शास्त्रेण विहितानि ब्राह्मणादीनां शमादीनि कर्माणि कथम् उच्यते सत्त्वादिगुणप्रविभक्तानि इति नैष दोषः शास्त्रेणापि ब्राह्मणादीनां सत्त्वादिगुणविशेषापेक्षयैव शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि? न गुणानपेक्षया? इति शास्त्रप्रविभक्तान्यपि कर्माणि गुणप्रविभक्तानि इति उच्यते।।कानि पुनः तानि कर्माणि इति? उच्यते --,
Sri Vallabhacharya
।।18.41।।एवं च त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः [महाना.8।14कैव.2] इति मोक्षसाधनतया निर्दिष्टः त्यागः सन्न्यासशब्दार्थः? न तदन्यः स च कर्तृत्वकामफलानां न्यासरूपः स्वस्मिन् तत्कर्तृत्वत्यागश्च परपुरुषान्तर्यामिकर्तृकत्वाद्यनुसन्धानेनेति सर्वं सगुणनिरूपणे सत्त्वगुणवृद्धिकार्यमिति तथोक्तम् इदानीमेवम्भूतकर्माधिकारिणां ब्राह्मणादीनां स्वभावानुसारिसत्त्वादिगुणभेदभिन्नवृत्त्या सह कर्त्तव्यकर्मस्वरूपं निरूपयति ब्राह्मणक्षत्ित्रयविशामिति। स्वभावः सहजः संस्कारात्मकस्तत्प्रभवैर्गुणैर्विभद्यंते? तत्र स्वभावप्रभवैर्गुणैः सात्त्विका ब्राह्मणाः सृष्टाः? सात्त्विकराजसाः क्षत्ित्रयाः? तामसराजसा वैश्याः? तामसाः शूद्राः एषामपि व्यत्यये निजपूर्वकृतिरेव हेतुरिति हे परन्तप पुरा तथा प्रविभक्तानि कर्माणि।