Aranya Kanda

अरण्य काण्ड — Sections 2130

Section 21
छंद

तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।। कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम।। अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर।। भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ।। तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि।। आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार।। रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि।। छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच।। उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन।। चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान।। भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड।। नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड।। खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल।। कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं। बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं।। रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा। जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा।। अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।। संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं।। मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे। अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे।। सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं। करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं।। प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका। दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका।। महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी। सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी।। सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो। देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर् यो।।

दोहा/सोरठा

राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान। करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान।।20(क)।। हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान। अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान।।20(ख)।।

Section 22
चौपाई

जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।। तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए। सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।। पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।। धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा।। बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी।। करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।। राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा।। बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ।। संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।। प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी।।

दोहा/सोरठा

रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि। अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।21(क)।। सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ। तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।

Section 23
चौपाई

सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।। कह लंकेस कहसि निज बाता। केंइँ तव नासा कान निपाता।। अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए।। समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी।। जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन।। देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना।। अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता।। सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।। रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी।। तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा।। खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा।। खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।

दोहा/सोरठा

सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति। गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति।।22।।

Section 24
चौपाई

सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।। खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।। सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।। तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।। होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।। जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ।। चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ।। इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।

दोहा/सोरठा

लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद। जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद।। 23।।

Section 25
चौपाई

सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।। तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा।। जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी।। निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रुप सुबिनीता।। लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना।। दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।। नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।। भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।

दोहा/सोरठा

करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात। कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात।।24।।

Section 26
चौपाई

दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें।। होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी।। तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा।। तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै।। मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।। सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं।। भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई।। जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।

दोहा/सोरठा

जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।। खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड।।25।।

Section 27
चौपाई

जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।। गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा।। तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना।। सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी।। उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।। उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें।। अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।। मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही।।

छंद

निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं। श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं।। निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी। निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी।।

दोहा/सोरठा

मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान। फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन।।26।।

Section 28
चौपाई

तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।। अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।। सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा।। सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला।। सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।। तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन।। मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा।। प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई।। सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।। प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी।। निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।। कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।। प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी।। तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा।। लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा।। प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा।। अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।

दोहा/सोरठा

बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ। निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ।।27।।

Section 29
चौपाई

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।। आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।। जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।। भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई।। मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।। बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू।। सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा।। जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं।। सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई।। इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा।। नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।। कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं।। तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा।। कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा।। जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।। सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।

दोहा/सोरठा

क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ। चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।

Section 30
चौपाई

हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।। आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।। हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।। बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।। बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।। सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।। गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।। अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।। सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।। धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।। रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।। आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।। की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।। जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।। सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।। तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।। राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।। उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।। धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।। चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।। तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।। काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।। सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।। करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।। गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।। एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।

दोहा/सोरठा

हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ। तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ।।29(क)।। जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम। सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम।।29(ख)।।

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