अरण्य काण्ड — Sections 31–40
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।। जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली।। निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं।। गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी।। अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ।। आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना।। हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।। लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती।। हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।। खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।। कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी।। बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।। श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।। सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू।। किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं।। एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।। पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी।। आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा।।
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।। निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।। नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही।। लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई।। दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना।। राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता।। जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा।। सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें।। जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई।। परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।। तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।। जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ।।31।।
गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।। स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।।
जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही।। पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं।।1।। बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं। गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं।। जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं।।2। जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।। करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं।। सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई। मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई।।3।। जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा।। सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी।।4।।
अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम। तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।।32।।
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।। गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी।। सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।। पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई।। संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।। आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।। दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।। सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव। मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।। पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।। रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।। ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।। सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।। सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।। स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।। प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।। केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।। अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।। कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।। जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।। भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।। नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।। प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।। छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।। सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।। आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।। नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।। नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।। सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।। जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।। मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।। जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी।। पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई।। सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा।। बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई।।
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे।। नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू।।
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि। महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि।।36।।
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।। बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।। लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।। नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।। हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।। तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।। संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।। सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।। राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।। देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल। सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।। देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात। डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।। कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका।। बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।। कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।। कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।। मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।। तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।। रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।। मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।। चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।। लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।। एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ। मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।। लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि। क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।। कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।। क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया।। सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।। उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।। पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।। संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।। जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।
पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म। मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।। सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं। जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।