Aranya Kanda

अरण्य काण्ड — Sections 4146

Section 41
चौपाई

बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।। बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।। चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।। सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।। ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।। चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।। नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना।। सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ।। कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।

दोहा/सोरठा

फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ। पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।

Section 42
चौपाई

देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।। देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।। तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।। बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।। बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।। मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।। ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।। यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।। गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।। करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।। स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।

दोहा/सोरठा

नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि। नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।

Section 43
चौपाई

सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।। देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी।। जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।। कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।। जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।। तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।। जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका।। राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।

दोहा/सोरठा

राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम। अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।। एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ। तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।

Section 44
चौपाई

अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।। राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।। तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।। सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।। करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।। गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई।। प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।। मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।। जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।। यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।

दोहा/सोरठा

काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि। तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।

Section 45
चौपाई

सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।। जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।। काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।। दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।। धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।। पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।। पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।। बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।

दोहा/सोरठा

अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि। ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।

Section 46
चौपाई

सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।। कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।। जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी।। पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद।। संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा।। सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।। षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।। अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।। सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।

दोहा/सोरठा

गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।। तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।

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