Ayodhya Kanda

अयोध्या काण्ड — Sections 281290

Section 281
चौपाई

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।। दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।। सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।। परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।। दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।। मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।। अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।। सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।

दोहा/सोरठा

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।। सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।

Section 282
चौपाई

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।। सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं।। सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।। कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।। सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।। पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।। सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति।। सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।

दोहा/सोरठा

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।

Section 283
चौपाई

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।। जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।। कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।। कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।। ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।। देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।। भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।। सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी।।

दोहा/सोरठा

लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।

Section 284
चौपाई

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।। राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।। भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।। कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।। जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।। कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ। अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।। सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।

दोहा/सोरठा

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि। को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।

Section 285
चौपाई

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।। रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।। तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।। गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।। लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।। नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।। सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।। देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।

दोहा/सोरठा

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय। हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय।।284।।

Section 286
चौपाई

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।। देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी।। प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।। सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।। रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै।। रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू।। अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल।। यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।।

दोहा/सोरठा

अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।। सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।।

Section 287
चौपाई

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।। तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।। जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।। लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।। उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।। सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।। चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।। मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की।।

दोहा/सोरठा

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि। धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।

Section 288
चौपाई

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।। पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।। जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।। गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।। पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।। पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।। कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं।। लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।।

दोहा/सोरठा

बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि।।287।।

Section 289
चौपाई

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।। मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।। सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि।। धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू।। सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही।। बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।। भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।। समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।

दोहा/सोरठा

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि। कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।

Section 290
चौपाई

अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।। भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी।। बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ।। बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं।। देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।। भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।। परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।। साधन सिद्ध राम पग नेहू।।मोहि लखि परत भरत मत एहू।।

दोहा/सोरठा

भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ। करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।।

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