Ayodhya Kanda

अयोध्या काण्ड — Sections 291300

Section 291
चौपाई

राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।। राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।। गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।। नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।। सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू।। उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।। अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।। तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा।।

दोहा/सोरठा

प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।

Section 292
चौपाई

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।। जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू।। तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।। राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें।। आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ।। करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।। राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए।। महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।।

दोहा/सोरठा

ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल। तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।।

Section 293
चौपाई

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।। सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही।। रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।। हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।। तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी।। समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा।। भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।। तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।।

दोहा/सोरठा

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।। संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।292।।

Section 294
चौपाई

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।। प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू।। कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।। सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।। एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर।। छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता।। आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना।। स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू।।

दोहा/सोरठा

राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि। सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।।

Section 295
चौपाई

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।। सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।। ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।। भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।। सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा।। देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।। राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे।। सब कोउ राम पेममय पेखा। भउ अलेख सोच बस लेखा।।

दोहा/सोरठा

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज। रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।।

Section 296
चौपाई

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।। फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया।। बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।। मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।। बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी।। सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।। भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।। अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका।।

दोहा/सोरठा

सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।। रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।।

Section 297
चौपाई

करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।। गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।। समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।। जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई।। तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू।। सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी।। बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू।। राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई।।

दोहा/सोरठा

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।

Section 298
चौपाई

सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।। कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।। सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।। भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला।। करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।। छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा।। हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई।। बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली।।

दोहा/सोरठा

निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु। करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।

Section 299
चौपाई

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।। सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।। समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।। स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई।। प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली।। जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।। राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।। सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।

दोहा/सोरठा

कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर। दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।

Section 300
चौपाई

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।। कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।। तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए।। देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।। को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी।। निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।। सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।। पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।

दोहा/सोरठा

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।299।।

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