बाल काण्ड — Sections 11–20
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा।। मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी।। भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ।। बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोन न बसन बिना बर नारी।। सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी।। सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही।। जदपि कबित रस एकउ नाही। राम प्रताप प्रकट एहि माहीं।। सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा।। धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।। भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी।।
मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।। गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की।। प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।। भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी।।
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग। दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग।।10(क)।। स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान। गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान।।10(ख)।।
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।। नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई।। तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं।। भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई।। राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।। कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी।। कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना।। हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।। जौं बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू।।
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग। पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।11।।
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।। चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें।। बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के।। तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी।। जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ।। ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने।। समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी।। एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका।। कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ।। कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा।। जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं।। समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई।।
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान। नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान।।12।।
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।। तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा।। एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।। ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।। सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी।। जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू।। गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।। बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहि पुनीत सुफल निज बानी।। तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा।। मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई।।
अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं। चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं।।13।।
एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।। ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना।। चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे।। कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा।। जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने।। भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें।। होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू।। जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं।। कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।। राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा।। तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे।।
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान। सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।। सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर। करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर।।14(ख)।। कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल। बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल।।14(ग)।। बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ। सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।14(घ)।। बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस। जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु।।14(ङ)।। बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ। संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी।।14(च)।। बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि। होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।14(छ)।।
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।। मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका।। गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी।। सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके।। कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।। अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।। सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला।। सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ।। भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती।। जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता।। होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी।।
सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ। तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ।।15।।
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।। प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।। सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए।। बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची।। प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू।। दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी।। करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी।। जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता।।
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।।16।।
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।। जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई।। प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।। राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।। बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता।। रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका।। सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन।। सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर।। रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी।। महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना।।
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।17।।
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।। बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए।। रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते।। बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे।। सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।। प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा।। जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की।। ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।। पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक।। राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक।।
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।18।।
बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।। बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो।। महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।। महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।। जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।। सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी।। हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को।। नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।। राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास।।19।।