Bala Kanda

बाल काण्ड — Sections 2130

Section 21
चौपाई

आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।। सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू।। कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के।। बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती।। नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता।। भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन । स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के।। जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से।।

दोहा/सोरठा

एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ। तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।।20।।

Section 22
चौपाई

समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।। नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।। को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू।। देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना।। रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।। सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।। नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।। अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।।

दोहा/सोरठा

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।21।।

Section 23
चौपाई

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।। ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा।। जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।। साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।। जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।। राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।। चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।। चहुँ जुग चहुँ श्रुति ना प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।

दोहा/सोरठा

सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन।।22।।

Section 24
चौपाई

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।। मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।। प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की।। एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू।। उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।। ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन धन आनँद रासी।। अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।। नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।।

दोहा/सोरठा

निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार। कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार।।23।।

Section 25
चौपाई

राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।। नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा।। राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।। रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी।। सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा।। भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।। दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन।।। निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन।।

दोहा/सोरठा

सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ। नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ।।24।।

Section 26
चौपाई

राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ।। नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे।। राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा।। नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं।। राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा।। राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी।। सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।। फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें।।

दोहा/सोरठा

ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि। रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।।25।।

Section 27
चौपाई

नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।। सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।। नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू।। नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।। ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ।। सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।। अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।। कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।

दोहा/सोरठा

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु।।26।।

Section 28
चौपाई

चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।। बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू।। ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें।। कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना।। नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला।। राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता।। नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।। कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू।।

दोहा/सोरठा

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल।।27।।

Section 29
चौपाई

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।। सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा।। मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती।। राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि दैखि दयानिधि पोसो।। लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती।। गनी गरीब ग्रामनर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर।। सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी।। साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला।। सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी।। यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ।। रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें।।

दोहा/सोरठा

सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु। उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु।।28(क)।। हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास। साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास।।28(ख)।।

Section 30
चौपाई

अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी।। समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें।। सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही।। कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की।। रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।। जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली।। सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।। ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने।।

दोहा/सोरठा

प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।। तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान।।29(क)।। राम निकाईं रावरी है सबही को नीक। जों यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक।।29(ख)।। एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ। बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ।।29(ग)।।

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