बाल काण्ड — Sections 161–170
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा।। नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही। चरन बंदी निज भाग्य सराही।। पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई।। मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी।। तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना।। बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा।। समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती।। सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना।।
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत। नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति।।160।।
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना।। सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ।। तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।। तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा।। जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी।। सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी।। सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई।। सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला।।
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु। लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु।।161(क)।। तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर। सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।161(ख)।।
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।। प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।। तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।। अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।। जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।। देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी।। नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई।। कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि। नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि।।162।।
जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं।। तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता।। तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।। भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा।। करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका।। उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी।। सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत तब लयऊ।। कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही।।
सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप। मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव।।163।।
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा।। गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा।। देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई।। उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें।। अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं।। सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना।। कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें।। प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी।।
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ। एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ।।164।।
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ।। कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा।। तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा।। जौं बिप्रन्ह सब करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा।। चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई।। बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहि कवनेहुँ काला।। हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू।। तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना।।
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि। मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि।।165।।
तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा।। छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी।। यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा।। आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं।। सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा।। राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।। जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें।। एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा।।
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ। तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ।।166।।
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं।। अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई।। मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई।। आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ।। जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू।। सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी।। बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।। जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू।।
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल। मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल।।167।।
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना।। सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही।। अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा।। जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ।। जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई।। अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई।। पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ।। जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू।।
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार। मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिंकरिब जेवनार।।168।।
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें।। करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा।। और एक तोहि कहऊँ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ।। तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया।। तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना।। मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा।। गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे।। मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचेहउँ सोवतहि निकेता।।
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि। जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि।।169।।