Bala Kanda

बाल काण्ड — Sections 171180

Section 171
चौपाई

सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी।। श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई।। कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा।। परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा।। तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई।। प्रथमहि भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे।। तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा।। जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ।।

दोहा/सोरठा

रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु। अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु।।170।।

Section 172
चौपाई

तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी।। मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई।। अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा।। परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई।। कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथे दिवस मिलब मैं आई।। तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी।। भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता।। नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई।।

दोहा/सोरठा

राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि। लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि।।171।।

Section 173
चौपाई

आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा।। जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना।। मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी।। कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं।। गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा।। उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा।। जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी।। समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा।।

दोहा/सोरठा

नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत। बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत।।172।।

Section 174
चौपाई

उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई।। मायामय तेहिं कीन्ह रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई।। बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा।। भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए।। परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला।। बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू।। भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू।। भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस आव मुख बानी।।

दोहा/सोरठा

बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार। जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार।।173।।

Section 175
चौपाई

छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई।। ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा।। संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ।। नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा।। बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा।। चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी।। तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा।। सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई।।

दोहा/सोरठा

भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर। किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर।।174।।

Section 176
चौपाई

अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए।। सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिचरत हंस काग किय जेहीं।। उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई।। तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए।। घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होई लराई।। जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी।। सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा।। रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई।।

दोहा/सोरठा

भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम। धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम।।।175।।

Section 177
चौपाई

काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा।। दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा।। भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा।। सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू।। नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना।। रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे।। कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका।। कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी।।

दोहा/सोरठा

उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप। तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।176।।

Section 178
चौपाई

कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई।। गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता।। करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा।। हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें।। एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा।। पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ।। जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू।। सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी।।

दोहा/सोरठा

गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु। तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु।।177।।

Section 179
चौपाई

तिन्हि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए।। मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा।। सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी।। हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई।। गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी।। सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा।। भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा।। तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका।।

दोहा/सोरठा

खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव। कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव।।178(क)।। हरिप्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ। सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ।।178(ख)।।

Section 180
चौपाई

रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे।। अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे।। दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई।। देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई।। फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा।। सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी।। जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे।। एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा।।

दोहा/सोरठा

कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ। मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ।।179।।

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