बाल काण्ड — Sections 201–210
एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता।। जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी।। रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी।। जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे।। भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही।। मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई।। एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा।। लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालनें घालि झुलावै।।
प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान। सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।200।।
एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।। निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना।। करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा।। बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई।। गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता।। बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई।। इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा।। देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी।।
देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड। रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड।। 201।।
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।। काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ।। देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी।। देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही।। तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा।। बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी।। अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना।। हरि जननि बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई।।
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।। अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि।। 202।।
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा।। कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई।। चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई।। परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा।। मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई।। भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा।। कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमकु ठुमकु प्रभु चलहिं पराई।। निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा।। धूरस धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए।।
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ। भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ।।203।।
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए।। जिन कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता।। भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता।। गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई।। जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी।। बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृपलीला।। करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा।। जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई।।
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल। प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल।।204।।
बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई।। पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी।। जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे।। अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं।। जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा।। बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई।। प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।। आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा।।
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप। भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप।।205।।
यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई।। बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहि बिपिन सुभ आश्रम जानी।। जहँ जप जग्य मुनि करही। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं।। देखत जग्य निसाचर धावहि। करहि उपद्रव मुनि दुख पावहिं।। गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहि न निसिचर पापी।। तब मुनिवर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा।। एहुँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौ दोउ भाई।। ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मै देखब भरि नयना।।
बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार। करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार।।206।।
मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयऊ लै बिप्र समाजा।। करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी।। चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा।। बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिवर हृदयँ हरष अति पावा।। पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी।। भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा।। तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ।। केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा।। असुर समूह सतावहिं मोही। मै जाचन आयउँ नृप तोही।। अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा।।
देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान। धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान।।207।।
सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी।। चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी।। मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा।। देह प्रान तें प्रिय कछु नाही। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माही।। सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाई।। कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा।। सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी।। तब बसिष्ट बहु निधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा।। अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए।। मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ।।
सौंपे भूप रिषिहि सुत बहु बिधि देइ असीस। जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस।।208(क)।। पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।। कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन।।208(ख)।।
अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला।। कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा।। स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्बामित्र महानिधि पाई।। प्रभु ब्रह्मन्यदेव मै जाना। मोहि निति पिता तजेहु भगवाना।। चले जात मुनि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई।। एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा।। तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही।। जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।।
आयुष सब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि। कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि।।209।।