Bala Kanda

बाल काण्ड — Sections 191200

Section 191
चौपाई

तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आई।। अर्ध भाग कौसल्याहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा।। कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ।। कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि।। एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी।। जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए।। मंदिर महँ सब राजहिं रानी। सोभा सील तेज की खानीं।। सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ।।

दोहा/सोरठा

जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल। चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल।।190।।

Section 192
चौपाई

नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।। मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा।। सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ।। बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्त्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा।। सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना।। गगन बिमल सकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा।। बरषहिं सुमन सुअंजलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी।। अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा।।

दोहा/सोरठा

सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम। जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम।।191।।

Section 193
छंद

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।। लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।। कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता। माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।। करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता। सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।। ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै। मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै।। उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै। कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।। माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा। यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।

दोहा/सोरठा

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।192।।

Section 194
चौपाई

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आई सब रानी।। हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी।। दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना।। परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठत करत मति धीरा।। जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई।। परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा।। गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा।। अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई।।

दोहा/सोरठा

नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह। हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह।।193।।

Section 195
चौपाई

ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा।। सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई।। बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई। सहज संगार किएँ उठि धाई।। कनक कलस मंगल धरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा।। करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं।। मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक।। सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू।। मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा।।

दोहा/सोरठा

गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद। हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद।।194।।

Section 196
चौपाई

कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ।। वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा।। अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती।। देखि भानू जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी।। अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अभीर मनहुँ अरुनारी।। मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा।। भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मूखर समयँ जनु सानी।। कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना।।

दोहा/सोरठा

मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ। रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ।।195।।

Section 197
चौपाई

यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत गुनगाना।। देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा।। औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी।। काक भुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ।। परमानंद प्रेमसुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले।। यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई।। तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा।। गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा।।

दोहा/सोरठा

मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहि असीस। सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस।।196।।

Section 198
चौपाई

कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती।। नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी।। करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा।। इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा।। जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।। सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा।। बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई।। जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा।।

दोहा/सोरठा

लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार। गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार।।197।।

Section 199
चौपाई

धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी।। मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि तेहिं सुख माना।। बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी।। भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई।। स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।। चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा।। हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा।। कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना।।

दोहा/सोरठा

ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद। सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या के गोद।।198।।

Section 200
चौपाई

काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा।। अरुन चरन पकंज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती।। रेख कुलिस धवज अंकुर सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे।। कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहि देखा।। भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी।। उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा।। कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई।। दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे।। सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला।। चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे।। पीत झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई।। रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहि देखा।।

दोहा/सोरठा

सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतीत। दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत।।199।।

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