बाल काण्ड — Sections 81–90
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा।। अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला।। दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी।। अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी।। सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा।। कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई।। नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।। गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।।80।।
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा।। अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा।। जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी।। तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं।। जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।। तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहि सत बार महेसू।। मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा।। देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी।।
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु। नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु।।81।।
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।। बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई।। भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा।। मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना।। तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला।। तेंहि सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते।। अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई।। तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे।।
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ। संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ।।82।।
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई।। सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा।। तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।। जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी।। पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं।। तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई।। एहि बिधि भलेहि देवहित होई। मर अति नीक कहइ सबु कोई।। अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू।।
सुरन्ह कहीं निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार। संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार।।83।।
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा।। पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही।। अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई।। चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा।। तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा।। कोपेउ जबहि बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू।। ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना।। सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सब भागा।।
भागेउ बिबेक सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे। सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे।। होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा। दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा।।
जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम। ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम।।84।।
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा।। नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई। संगम करहिं तलाव तलाई।। जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी।। पसु पच्छी नभ जल थलचारी। भए कामबस समय बिसारी।। मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका।। देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला।। इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी।। सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी।।
भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै। देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे।। अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं। दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं।।
धरी न काहूँ धिर सबके मन मनसिज हरे। जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ।।85।।
उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ।। सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू।। भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे।। रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना।। फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई।। प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा।। बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा।। जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा।।
जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही। सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही।। बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा। कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा।।
सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत। चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत।।86।।
देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा।। सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने।। छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छुटि समाधि संभु तब जागे।। भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी।। सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका।। तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा।। हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी।। समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी।।
जोगि अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई। रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई। अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही। प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही।।
अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु। बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु।।87।।
जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा।। कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा।। रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी।। देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए।। सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता।। पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा।। बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू।। कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी।।
सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु। निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु।।88।।
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन। कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा।। सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ।। पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा।। सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी।। तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साई।। अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए।। प्रथम गए जहँ रही भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी।।
कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस। अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस।।89।।