Bala Kanda

बाल काण्ड — Sections 7180

Section 71
चौपाई

सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।। सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें।। संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना।। दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू।। जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।। जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं।। बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन।। इच्छित फल बिनु सिव अवराधे। लहिअ न कोटि जोग जप साधें।।

दोहा/सोरठा

अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस। होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस।।70।।

Section 72
चौपाई

कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ।। पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना।। जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा।। न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी।। जौं न मिलहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू।। सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू।। अस कहि परि चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा।। बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं।।

दोहा/सोरठा

प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान। पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान।।71।।

Section 73
चौपाई

अब जौ तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू।। करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटहि कलेसू।। नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू।। अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका।। सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं।। उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी।। बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई।। जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी।।

दोहा/सोरठा

सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि। सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि।।72।।

Section 74
चौपाई

करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी।। मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा।। तपबल रचइ प्रपंच बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता।। तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा।। तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी।। सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी।। मातु पितुहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई।। प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता।।

दोहा/सोरठा

बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।। पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ।।73।।

Section 75
चौपाई

उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना।। अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू।। नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।। संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए।। कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा।। बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोई खाई।। पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नाम तब भयउ अपरना।। देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा।।

दोहा/सोरठा

भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि। परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि।।74।।

Section 76
चौपाई

अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भउ अनेक धीर मुनि ग्यानी।। अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी।। आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं।। मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा।। सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी।। उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा।। जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब सें सिव मन भयउ बिरागा।। जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा।।

दोहा/सोरठा

चिदानन्द सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम। बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम।।75।।

Section 77
चौपाई

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना।। जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना।। एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती।। नैमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा।। प्रगटै रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला।। बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा।। बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा।। अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी।।

दोहा/सोरठा

अब बिनती मम सुनेहु सिव जौं मो पर निज नेहु। जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु।।76।।

Section 78
चौपाई

कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं।। सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा।। मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी।। तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी।। प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना।। कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ।। अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी।। तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए।।

दोहा/सोरठा

पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु। गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु।।77।।

Section 79
चौपाई

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी।। बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी।। केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू।। कहत बचत मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई।। मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा।। नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना।। देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा।।

दोहा/सोरठा

सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तब देह। नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह।।78।।

Section 80
चौपाई

दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई।। चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला।। नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी।। मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा।। तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा।। निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली।। कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ।। पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही।।

दोहा/सोरठा

अब सुख सोवत सोचु नहि भीख मागि भव खाहिं। सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं।।79।।

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