Lanka Kanda

लंका काण्ड — Sections 7180

Section 71
चौपाई

भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा।। चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी।। यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई।। कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी।। सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना।। राम सेन निज पाछैं घाली। चले सकोप महा बलसाली।। खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने।। लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा।। लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी। रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी।। धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी।। काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा।। उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रेलोका।।

दोहा/सोरठा

करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि। गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि।।70।।

Section 72
चौपाई

सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो।। बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ।। सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा।। तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा।। सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें।। धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा।। परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर।। तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना।। सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं।। करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए।। गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए।। बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए।।

छंद

संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी। श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी।। भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने। कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने।।

दोहा/सोरठा

निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम। गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम।।71।।

Section 73
चौपाई

दिन कें अंत फिरीं दोउ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी।। राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा।। छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती।। बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई।। रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी।। मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ।। देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई।। इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ।। एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना।। इत कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा।। लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू।।

दोहा/सोरठा

मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।। गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास।।72।।

Section 74
चौपाई

सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना।। डारह परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना।। दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई।। धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना।। गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहि तेहि न दुखित फिरि आवहिं।। अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर।। जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर।। मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला।। पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन।। पुनि रघुपति सैं जूझे लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा।। ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी।। नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना।। रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो।।

दोहा/सोरठा

गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास। सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास।।73।।

Section 75
चौपाई

चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी।। अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी।। ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा।। जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा।। बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही।। अस कहि तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो।। मारिसि मेघनाद कै छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती।। पुनि रिसान गहि चरन फिरायौ। महि पछारि निज बल देखरायो।। बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा।। इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो।।

दोहा/सोरठा

खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ। माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ। 74(क)।। गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ। चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ।।74(ख)।।

Section 76
चौपाई

मेघनाद के मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी।। तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा।। इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनहु नाथ बल अतुल उदारा।। मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन।। जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि।। सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना।। लछिमन संग जाहु सब भाई। करहु बिधंस जग्य कर जाई।। तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही।। मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई।। जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेहु तीनिउ जन।। जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन।। प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा।। जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावौं।। जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई।।

दोहा/सोरठा

रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत। अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत।।75।।

Section 77
चौपाई

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा।। कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा।। तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई।। लै त्रिसुल धावा कपि भागे। आए जहँ रामानुज आगे।। आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा।। कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए।। प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा।। उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा।। फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा।। आवत देखि क्रुद्ध जनु काला। लछिमन छाड़े बिसिख कराला।। देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना।। बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई।। देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा।। लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा। एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा।। सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा।। छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा।।

दोहा/सोरठा

रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान। धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान।।76।।

Section 78
चौपाई

बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो।। तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा। चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा।। बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं।। जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा।। अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए। लछिमन कृपासिन्धु पहिं आए।। सुत बध सुना दसानन जबहीं। मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं।। मंदोदरी रुदन कर भारी। उर ताड़न बहु भाँति पुकारी।। नगर लोग सब ब्याकुल सोचा। सकल कहहिं दसकंधर पोचा।।

दोहा/सोरठा

तब दसकंठ बिबिध बिधि समुझाईं सब नारि। नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि।।77।।

Section 79
चौपाई

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन।। पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।। निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा।। सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जा कर मन डोला।। सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई।। निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा।। अस कहि मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा।। चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली।। असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला।।

छंद

अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते।। गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने।।

दोहा/सोरठा

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम। भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम।।78।।

Section 80
चौपाई

चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा।। बिबिध भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना।। चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे।। बरन बरद बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया।। अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी।। चलत कटक दिगसिधुंर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं।। उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई।। पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं।। भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारू राग सुभट सुखदाई।। केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं।। कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा।। हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई।। यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई।।

छंद

धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते। मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते।। नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं। जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं।।

दोहा/सोरठा

दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि। भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि।।79।।

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