लंका काण्ड — Sections 81–90
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।। अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।। नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना।। सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।। सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।। बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।। ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना।। दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।। अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना।। कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा।। सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।।
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर। जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।।80(क)।। सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज। एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज।।80(ख)।। उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान। लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन।।80(ग)।।
सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना।। हमहू उमा रहे तेहि संगा। देखत राम चरित रन रंगा।। सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते।। एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं।। मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं।। उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं।। निसिचर भट महि गाड़हि भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू।। बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे।।
क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं।। मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं।। धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं।। धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही।।
निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप। रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप।।81।।
धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर।। गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा।। लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू।। चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी।। इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा।। चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना।। पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाइ काल की नाई।। तेहि देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने।।
संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं। रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदसि कहँ कपि भागहीं।। भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे। रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे।।
निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ।।82।।
रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू।। खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती।। अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा।। कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे।। पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा।। सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला।। पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं।। उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी।।
सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही। पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही।। ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी। तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी।।
देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर। आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर।।83।।
जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा।। मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा।। मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा।। धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही।। अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो।। कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता।। सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला।। पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए।।
आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो। गिर् यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो।। सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो। रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो।।
उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य। राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य।।84।।
इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई।। नाथ करइ रावन एक जागा। सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा।। पठवहु नाथ बेगि भट बंदर। करहिं बिधंस आव दसकंधर।। प्रात होत प्रभु सुभट पठाए। हनुमदादि अंगद सब धाए।। कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका। पैठे रावन भवन असंका।। जग्य करत जबहीं सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा।। रन ते निलज भाजि गृह आवा। इहाँ आइ बक ध्यान लगावा।। अस कहि अंगद मारा लाता। चितव न सठ स्वारथ मन राता।।
नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं। धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं।। तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई। एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई।।
जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास। चलेउ निसाचर क्रुर्द्ध होइ त्यागि जिवन कै आस।।85।।
चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर।। भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना।। चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा।। प्रभु सन्मुख धाए खल कैंसें। सलभ समूह अनल कहँ जैंसें।। इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही।। अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही।। देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना। जटा जूट दृढ़ बाँधै माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे।। अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा।। कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा।।
सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो। भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो।। कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे। ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे।।
सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार। जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार।।86।।
एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी। देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा।। बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं।। गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा।। कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए।। उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा।। दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा।। रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई।। लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं।। स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी।।
कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी। दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी।। जल जंतुगज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने। सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने।।
बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन। कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन।।87।।
मज्जहि भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला।। काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं।। एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई।। कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे।। खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए।। बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं।। जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं।। भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं।। जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं।। कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं।।
बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं। खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं।। बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए। संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए।।
रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार। मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार।।88।।
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा।। सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा।। तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा।। चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी।। रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी।। सही न जाइ कपिन्ह कै मारी। तब रावन माया बिस्तारी।। सो माया रघुबीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची।। देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी।।
बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे। जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे।। निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी। माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी।।
बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर। द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर।।89।।