उत्तर काण्ड — Sections 11–20
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।। ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।। कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।। गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।। सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।। मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।। कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।। अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै।।
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ। रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ।।10(क)।। जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ। हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ।।10(ख)।।
अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।। राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।। सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए।। पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे।। अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई।। भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई।। पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।। करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे।।
सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ। दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ।।11(क)।। राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि। देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि।।11(ख)।। सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद। चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद।।11(ग)।।
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।। रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई।। जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।। बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।। प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।। सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी।। बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे।। सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं।।
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं। नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं।। भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते। गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते।।1।। श्री सहित दिनकर बंस बूषन काम बहु छबि सोहई। नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई।। मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे। अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे।।2।।
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस। बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस।।12(क)।। भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम। बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम।। 12(ख)।। प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान। लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान।।12(ग)।।
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने। दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।। अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे। जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।।1।। तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे। भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।। जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे। भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।2।। जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी।। बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।।3।। जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी। नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी।। ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।। अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने। षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।। फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे। पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।। जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं। ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।। करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं। मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार। अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13(क)।। बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर। बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13(ख)।।
जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।। अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।। दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।। रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।। महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।। मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।। मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।। हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।। बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।। भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।। अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।। अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।। नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।। एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।। करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।। सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।। मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।। तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।। गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।। रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग। पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।14(क)।। बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास। तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास।।14(ख)।।
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी।। महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।। जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं।। सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं।। सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।। खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी।। बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी।। नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी।। नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज।। मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।।
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति। जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति।।15।।
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।। तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।। परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे।। तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई।। ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे।। अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही।। सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना।। सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती।।
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम। सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम।।16।।
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।। एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे।। परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा।। प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं।। तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।। सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए।। प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए।। अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला।।
जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ। हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ।।17(क)।। तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि। अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि।।17(ख)।।
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।। मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली।। असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।। मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।। तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा।। बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना।। नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।। अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही।।
अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव। प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव।।18(क)।। निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ। बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ।।18(ख)।।
भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।। अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा।। बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।। राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।। प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी।। अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए।। तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।। दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।। पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।। अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता।।
कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि।।19(क)।। अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत। तासु प्रीति प्रभु सन कहि मगन भए भगवंत।।!9(ख)।। कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि। चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि।।19(ग)।।