Uttara Kanda

उत्तर काण्ड — Sections 2130

Section 21
चौपाई

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।। जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू।। तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।। बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी।। चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा।। रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।। राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका।। बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।।

दोहा/सोरठा

बरनाश्रम निज निज धरम बनिरत बेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग।।20।।

Section 22
चौपाई

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।। सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।। चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।। राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।। अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।। नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।। सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।। सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।

दोहा/सोरठा

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।। काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं।।21।।

Section 23
चौपाई

भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।। भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।। सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी।। सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी।। सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला।। राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा।। सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी।। एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी।।

दोहा/सोरठा

दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज। जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज।।22।।

Section 24
चौपाई

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।। खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।। कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।। सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गूंजत अलि लै चलि मकरंदा।। लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं।। ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।। प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।। सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी।। सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।। सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।।

दोहा/सोरठा

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज। मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र के राज।।23।।

Section 25
चौपाई

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।। श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर।। पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता।। जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई।। जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी।। निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई।। जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।। कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।। उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता।।

दोहा/सोरठा

जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ। राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ।।24।।

Section 26
चौपाई

सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।। प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।। राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती।। हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।। अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं।। दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।। दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर।। दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।।

दोहा/सोरठा

ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार। सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार।।25।।

Section 27
चौपाई

प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।। बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं।। अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं।। भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई।। बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा।। सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं।। सब कें गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना।। नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।।

दोहा/सोरठा

अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज। सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज।।26।।

Section 28
चौपाई

नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।। दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं।। जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं।। पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर।। नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।। महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।। धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत।। बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।।

छंद

मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची।। सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे।।

दोहा/सोरठा

चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ। राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ।।27।।

Section 29
चौपाई

सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।। लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई।। गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।। नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए।। मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत।। जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।। सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक।। राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रूचिर बजारू।।

छंद

बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए। जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए।। बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते। सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे।।

दोहा/सोरठा

उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर। बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।28।।

Section 30
चौपाई

दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।। पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।। राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।। तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।। कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।। तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।। पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई।। देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा।।

छंद

बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं।। बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं।।

दोहा/सोरठा

रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।29।।

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