उत्तर काण्ड — Sections 111–120
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।। एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ।। चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई।। खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला।। प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा।। मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी।। कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।। प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।। भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता।। जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।। बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा।। सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा।। छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी।। राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।। जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई।। निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई।।
गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग।।110(क)।। मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन। देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन।।110(ख)।। सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज। मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज।।110(ग)।। तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान। सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान।।110(घ)।।
तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।। ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी।। लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा।। अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा।। मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।। सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहि बेदा।। बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।। पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।। राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया।। भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा।। मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।। तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी।। उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा।। सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ।। अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।।
-बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान। मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान।।111(क)।। क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान।।111(ख)।।
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।। परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।। बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें।। काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।। भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक।। राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।। पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।। लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।। हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।। अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।। एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।। पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।। मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि।। सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।। सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।। लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।
तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ। सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ।।112(क)।। उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध।।112(ख)।।
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।। कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी।। मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना।। रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।। अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।। मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा।। बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।। सुंदर सुखद मिहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा।। मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा।। सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई।। रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा।। तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी।। राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।। मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।। निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा।। राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें।।
-सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान। कामरूप इच्धामरन ग्यान बिराग निधान।।113(क)।। जेंहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत। ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत।।113(ख)।।
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ।। राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।। बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ।। जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा।। एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी।। सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ।। करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई।। हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ।। इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा।। करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना।। जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा।। तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ।। पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा।। कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई।। कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी।।
ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह। निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह।।114(क)।। भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप।।114(ख)।।
जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।। ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी।। सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई।। ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।। सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी।। तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं।। सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा।। एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही।। कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना।। सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं।। ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता।। सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना।। भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।। नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर।। ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना।। पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती।।
-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।। न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।। सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट।।115(ख)।।
इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।। मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा।। माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।। पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी।। भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया।। राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी।। तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।। अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी।।
यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ। जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ।।116(क)।। औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन। जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन।।116(ख)।।
सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।। ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।। सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।। जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।। तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।। श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।। जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।। अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई।। सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।। जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।। तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।। नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।। परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई।। तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।। मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी।। तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।117(क)।। तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ। चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।117(ख)।। तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि। तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।117(ग)।। एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।। जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब।।117(घ)।।
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।। आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा।। प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा।। तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा।। छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई।। छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।। रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई।। कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा।। होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।। जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी।। इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।। आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी।। जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।। ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।। इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई।। बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।।
तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस। हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस।।118(क)।। कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक।।118(ख)।।
ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।। जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई।। अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद।। राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई।। जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।। तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई।। अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।। भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।। भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी।। असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।।
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।। भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि।।119(क)।। जो चेतन कहँ ज़ड़ करइ ज़ड़हि करइ चैतन्य। अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य।।119(ख)।।