उत्तर काण्ड — Sections 101–110
पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।। तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा में चरित्र कलिजुग कर।। आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं।। कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।। जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।। नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।। ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।। बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।। सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।। सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।
भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग। करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग।।100(क)।। श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहि न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।100(ख)।।
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।। तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।। कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती।। सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।। ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें।। नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं।। धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।। नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो।। कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी।। कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।।
सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड। मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड।।101(क)।। तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान। देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान।।101(ख)।।
अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।। सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता।।1।। नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।। लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।। कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा। नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।।3।। इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।। सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।।4।। दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।। तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।।5।।
सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउँ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार।।102(क)।। कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग।।102(ख)।।
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।। त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।। द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।। कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।। कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना।। सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि।। सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं।। कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।।
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास। गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास।।103(क)।। प्रगट चारि पद धर्म के कलिल महुँ एक प्रधान। जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान।।103(ख)।।
नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।। सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।। सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।। बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।। तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।। बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।। काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।। नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया।।
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं। भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं।।104(क)।। तेहि कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस। परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस।।104(ख)।।
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।। गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।। बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा।। परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक।। तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता।। बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं।। संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा।। जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई।।
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह। हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह।।105(क)।। गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम। मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई।।105(ख)।।
एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।। सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।। रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता।। जासु चरन अज सिव अनुरागी। तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी।। हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ।। अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ।। मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती।। अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा।। जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा।। धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई।। रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।। मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।। सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।। कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती।। उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं।। मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई।।
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम। गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम।।106(क)।। सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस।।106(ख)।।
मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।। जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा।। तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही।। जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा।। जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं।। त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा।। बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी।। महा बिटप कोटर महुँ जाई।।रहु अधमाधम अधगति पाई।।
हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।। कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप।।107(क)।। करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि।।107(ख)।।
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।। निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।। करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं।। तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।। चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।। मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।। प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।। त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।। कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनान्ददाता पुरारी।। चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।। न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।। न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।। न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।। जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु। पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।। जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु। निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु।।108(ख)।। तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान। तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।108(ग)।। संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल। साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल।।108(घ)।।
एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।। बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।। जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा।। तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।। छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।। मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।। जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।। कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।। रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।। पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।। सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।। अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना।। इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला।। जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई।। अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।। औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।।
सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि। मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि।।109(क)।। प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल। पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल।।109(ख)।। जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान। जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान।।109(ग)।। सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस। एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस।।109(घ)।।