Uttara Kanda

उत्तर काण्ड — Sections 3140

Section 31
चौपाई

जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।। भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि।। जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि।। धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि।। काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि।। लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि।। संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि।। जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि।। बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि।। मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि।।

दोहा/सोरठा

एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान। सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान।।30।।

Section 32
चौपाई

जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।। पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।। जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी।। अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।। बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ।। मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा।। धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना।। सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका।।

दोहा/सोरठा

यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास।।31।।

Section 33
चौपाई

भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।। सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए।। जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए।। ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।। रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।। आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।। तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी।। राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी।।

दोहा/सोरठा

देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह। स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह।।32।।

Section 34
चौपाई

कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।। मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।। स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन।। एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।। तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।। कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।। आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।। बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा।।

दोहा/सोरठा

संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहि संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ।।33।।

Section 35
चौपाई

सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।। जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय।। जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।। जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।। ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद।। तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन।। सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय।। द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय।।

दोहा/सोरठा

परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम।।34।।

Section 36
चौपाई

देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।। प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु।। भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक।। मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय।। आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक।। भूप मौलि मन मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी।। मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।। रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।। तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन।।

दोहा/सोरठा

बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ। ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ।।35।।

Section 37
चौपाई

सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।। पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं।। सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी।। अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना।। जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता।। नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं।। तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।। सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।।

दोहा/सोरठा

नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह। केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह।।36।।

Section 38
चौपाई

करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।। संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई।। श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।। सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन।। संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई।। संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता।। संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।। काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।।

दोहा/सोरठा

ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड। अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड।।37।।

Section 39
चौपाई

बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।। सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी।। कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया।। सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी।। बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन।। सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।। ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर।। सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं।।

दोहा/सोरठा

निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज। ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज।।38।।

Section 40
चौपाई

सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।। तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई।। खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी।। जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई।। काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।। बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।। झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।। बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा।।

दोहा/सोरठा

पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद। ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद।।39।।

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