Uttara Kanda

उत्तर काण्ड — Sections 91100

Section 91
चौपाई

बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।। राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।। बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ।। श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई।। बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा।। सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई।। निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा।। कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा।।

दोहा/सोरठा

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।।90(क)।। अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल। भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद।।90(ख)।।

Section 92
चौपाई

निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई।। कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी।। महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा।। निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं।। तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता।। तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा।। रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन।। सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा।।

दोहा/सोरठा

मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास। ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास।।91(क)।। काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत। धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत।।91(ख)।।

Section 93
चौपाई

प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला।। तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन।। हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा।। कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना।। सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई।। बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता।। धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना।। भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा।।

छंद

निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै। जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै।। एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनिस हरिहि बखानहीं। प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं।।

दोहा/सोरठा

रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ। संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ।।92(क)।। भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन। तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन।।92(ख)।।

Section 94
चौपाई

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए।। नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना।। पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।। पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा।। गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।। संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता।। तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक।। तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना।।

दोहा/सोरठा

ताहि प्रसंसि बिबिध बिधि सीस नाइ कर जोरि। बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि।।93(क)।। प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि। कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि।।93(ख)।।

Section 95
चौपाई

तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा।। ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा।। कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई।। राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी।। नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं।। मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई।। अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा।। अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी।।

दोहा/सोरठा

तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन। मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल।।94(क)।। प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग। कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग।।94(ख)।।

Section 96
चौपाई

गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा।। धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी।। सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई।। सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई।। जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना।। सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा।। एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई।। जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई।।

दोहा/सोरठा

पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं। अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित।।95(क)।। पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर। कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम।।95(ख)।।

Section 97
चौपाई

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।। सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।। राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।। राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।। तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।। प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा।। नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना।। कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।। देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई।। सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी।।

दोहा/सोरठा

प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस। सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस।।96(क)।। पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।। नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल।।96(ख)।।

Section 98
चौपाई

तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई।। सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी।। धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला।। जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी।। अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा।। कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई।। अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी।। सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी।।

दोहा/सोरठा

कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ। दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ।।97(क)।। भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म। सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म।।97(ख)।।

Section 99
चौपाई

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।। द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन।। मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा।। मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई।। सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी।। जौ कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।। निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी।। जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।।

दोहा/सोरठा

असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं।।98(क)।। जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ।।98(ख)।।

Section 100
चौपाई

नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई।। सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना।। सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी।। गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी।। सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना।। गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा।। हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।। मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं।।

दोहा/सोरठा

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात। कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात।।99(क)।। बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि। जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि।।99(ख)।।

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