हरिविमुख-निन्दा

विनय तथा भक्ति · 2 padas

अचंभो इन लोगनि कौ आवै । छाँड़े स्याम-नाम-अम्रित फल, माया-विष-फल भावै । निंदत मूढ़ मलय चंदन कौं राख अंग लपटावै । मानसरोवर छाँड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै । पगतर जरत न जानै मूरख, घर तजि घूर बुझावै । चौरासी लख स्वाँग धरि, भ्रमि-भ्रमि जमहि हँसावै । मृगतृष्ना आचार-जगत जल, ता सँग मन ललचावै । कहत जु सूरदास संतनि मिलि हरि जस काहे न गावै ॥1॥

Pada 1

भजन बिनु कूकर-सूकर जैसौ । जैसै घर बिलाव के मूसा, रहत विषय-बस वैसौ । बग-बगुली अरु गीध-गीधिनी, आइ जनम लियौ तैसी । उनहूँ कैं गृह, सुत, दारा हैं, उन्हैं भेद कहु कैसौ । जीव मारि कै उदर भरत हैं; तिनकौ लेखी ऐसी । सूरदास भगवंत-भजन बिनु, मनो ऊँट-वृष-भैसौं ॥2॥

Pada 2

चित्-बुद्धि-संवादसत्संग-महिमा