अचंभो इन लोगनि कौ आवै । छाँड़े स्याम-नाम-अम्रित फल, माया-विष-फल भावै । निंदत मूढ़ मलय चंदन कौं राख अंग लपटावै । मानसरोवर छाँड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावै । पगतर जरत न जानै मूरख, घर तजि घूर बुझावै । चौरासी लख स्वाँग धरि, भ्रमि-भ्रमि जमहि हँसावै । मृगतृष्ना आचार-जगत जल, ता सँग मन ललचावै । कहत जु सूरदास संतनि मिलि हरि जस काहे न गावै ॥1॥
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