चित्-बुद्धि-संवाद

विनय तथा भक्ति · 2 padas

चकई री, चलि चरन-सरोवर, जहाँ न प्रेम वियोग । जहँ भ्रम-निसा होति नहिं कबहूँ, सोइ सायर सुख जोग । जहाँ सनक-सिव हंस, मीन मुनि, नख रवि-प्रभा प्रकास । प्रफुलित कमल, निमिष नहिं ससि-डर, गुंजत निगम सुवास । जिहिं सर सभग-मुक्ति-मुक्ताफल, सुकृत-अमृत-रस पीजै । सो सर छाँड़ि कुबुद्धि बिहंगम,इहाँ कहाँ रहि कीजे ॥ लक्षमी सहित होति नित क्रीड़ा, सोभित सूरजदास । अब न सुहात विषय-रस-छीलर,वा समुद्र की आस ॥1॥

Pada 1

सुवा, चलि ता बन कौ रस पीजै । जा बन राम-नाम अम्रति-रस, स्रवन पात्र भरि लीजै । को तेरौ पुत्र, पिता तू काकौ, धरनी, घर को तेरौ ? काग सृगाल-स्वान कौ भोजन, तू कहै मेरौ मेरौ ! बन बारानिसि मुक्ति-क्षेत्र है, चलि तोकौ, दिखराऊँ । सूरदास साधुनि की संगति, बड़े भाग्य जो पाऊँ ॥2॥

Pada 2

मन प्रबोधहरिविमुख-निन्दा