चकई री, चलि चरन-सरोवर, जहाँ न प्रेम वियोग । जहँ भ्रम-निसा होति नहिं कबहूँ, सोइ सायर सुख जोग । जहाँ सनक-सिव हंस, मीन मुनि, नख रवि-प्रभा प्रकास । प्रफुलित कमल, निमिष नहिं ससि-डर, गुंजत निगम सुवास । जिहिं सर सभग-मुक्ति-मुक्ताफल, सुकृत-अमृत-रस पीजै । सो सर छाँड़ि कुबुद्धि बिहंगम,इहाँ कहाँ रहि कीजे ॥ लक्षमी सहित होति नित क्रीड़ा, सोभित सूरजदास । अब न सुहात विषय-रस-छीलर,वा समुद्र की आस ॥1॥
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