हरि-रस तौंऽब जाई कहुँ लहियै । गऐं सोच आऐँ नहिं आनँद, ऐसौ मारग गहियै । कोमल बचन, दीनता सब सौं, सदा आनँदित रहियै । बाद बिवाद हर्ष-आतुरता, इतौ द्वँद जिय सहियै । ऐसी जो आवै या मन मैं, तौ सुख कहँ लौं कहियै । अष्ट सिद्दि;नवनिधि, सूरज प्रभु, पहुँचै जो कछु चहियै ॥1॥
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