स्थितप्रज्ञ

विनय तथा भक्ति · 2 padas

हरि-रस तौंऽब जाई कहुँ लहियै । गऐं सोच आऐँ नहिं आनँद, ऐसौ मारग गहियै । कोमल बचन, दीनता सब सौं, सदा आनँदित रहियै । बाद बिवाद हर्ष-आतुरता, इतौ द्वँद जिय सहियै । ऐसी जो आवै या मन मैं, तौ सुख कहँ लौं कहियै । अष्ट सिद्दि;नवनिधि, सूरज प्रभु, पहुँचै जो कछु चहियै ॥1॥

Pada 1

जौ लौं मन-कामना न छूटै । तौ कहा जोग-जज्ञ-व्रत कीन्हैं, बिनु कन तुस कौं कूटै । कहा सनान कियैं तीरथ के, अंग भस्म जट जूटै ? कहा पुरान जु पढ़ैं अठारह, ऊर्ध्व धूम के घूँटे । जग सोभा की सकल बड़ाई इनतैं कछू न खूटै ॥2॥

Pada 2

सत्संग-महिमाआत्मज्ञान