आत्मज्ञान

विनय तथा भक्ति · 2 padas

अपुनपौ आपुन ही बिसर्‌यौ । जैसे स्वान काँच-मंदिर मैं, भ्रमि-भ्रमि भूकि पर्‌यौ । ज्यौं सौरभ मृग-नाभि बसत है, द्रुम तृन सूँधि फिर्‌यौ । ज्यौं सपने मै रंक भूप भयौ, तसकर अरि पकर्‌यौ । ज्यौं केहरि प्रतिबिंब देखि कै, आपन कूप पर्‌यौ । जैसें गज लखि फटिकसिला मैं, दसननि जाइ अर्‌यौ । मर्कट मूठि छाँड़ि नहीं दीनी, घर-घर-द्वार फिर्‌यौ । सूरदास नलिनी कौ सुवटा, कहि कौनैं पकर्‌यौ ॥1॥

Pada 1

अपुनपौ आपुन ही मैं पायौ । सब्दहि सब्द भयौ उजियारो, सतगुरु भेद बतायौ । ज्यौं कुरंग-नाभी कस्तूरी, ढूँढ़त फिरत भुलायौ । फिरि चितयौ जब चेतन ह्वै करि, अपनैं ही तन छायौ । राज-कुमारि कंठ-मनि-भूषन भ्रम भयौ कहूँ गँवायौ । दियौ बताइ और सखियनि तब, तनु कौ ताप नसायौ । सपने माहिं नारि कौं भ्रम भयौ, बालक कहूँ हिरायौ । जागि लख्यौ, ज्यौं कौ त्यौं ही है, ना कहूँ गयौ न आयौ । सूरदास समुझे को यह गति, मनहीं मन मुसुकायौ । कहि न जाइ या सुख की महिमा, ज्यौं गूँगैं गुर खायौ ॥2॥

Pada 2

स्थितप्रज्ञकृष्ण-जन्म