अबिगत-गति कछु कहत न आवै । ज्यौं गूँगै मीठे फल कौ रस अंतरगत हीं भावै । परम स्वाद सबही सु निरंतर अमित तोष उपजावै । मन-बानी कौं अगम अगोचर, सो जानै जो पावै । रूप-रेख-गुन-जाति जुगति-बिनु निरालंब कित धावै । सब विधि अगम बिचारहिं तातैं सूर सगुन -पद गावै ॥1॥
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