भक्त-वत्सलता

विनय तथा भक्ति · 8 padas

बासुदेव की बड़ी बड़ाई । जगत पिता, जगदीस, जगत-गुरु, निज भक्तनि-की सहत ढिठाई । भृगु कौ चरन राखि उर ऊपर, बोले बचन सकल-सुखदाई । सिव-बिरंचि मारन कौं धाए, यह गति काहू देव न पाई । बिनु-बदलैं उपकार करत हैं, स्वारथ बिना करत मित्राई । रावन अरि कौ अनुज विभीषन, ताकौं मिले भरत की नाई । बकी कपट करि मारन आई, सौ हरि जू बैकुंठ पठाई । बिनु दीन्हैं ही देत सूर-प्रभु, ऐसे हैं जदुनाथ गुसाईं ॥1॥

Pada 1

प्रभु कौ देखौ एक सुभाइ । अति-गंभीर-उदार-उदधि हरि, जान-सिरोमनि राइ । तिनका सौं अपने जनकौ गुन मानत मेरु-समान । सकुचि गनत अपराध-समुद्रहिं बूँद-तुल्य भगवान । बदन-प्रसन्न कमल सनमुख ह्वै देखत हौं हरि जैसें । बिमुख भए अकृपा न निमिषहूँ, फिरि चितयौं तौ तैसें । भक्त-बिरह-कातर करुनामय, डोलत पाछैं लागे । सूरदास ऐसे स्वामौ कौं देहिं पीठि सो अभागे ॥2॥

Pada 2

रामभक्तवत्सल निज बानौं । जाति, गोत कुल नाम, गनत नहिं, रंक होइ कै रानौं । सिव-ब्रह्मादिक कौन जाति प्रभु, हौं अजान नहिं जानौं । हमता जहाँ तहाँ प्रभु नाहीं, सो हमता क्यौं मानौं ? प्रगट खंभ तैं दए दिखाई, जद्यपि कुल कौ दानौ । रघुकुल राघव कृष्न सदा ही, गोकुल कीन्हौं थानौ । बरनि न जाइ भक्त की महिमा, बारंबार बखानौं । ध्रुव रजपूत, बिदुर दासी-सुत कौन कौन अरगानौ । जुग जुग बिरद यहै चलि आयौ, भक्तनि हाथ बिकानौ । राजसूय मैं चरन पखारे स्याम लिए कर पानौ । रसना एक, अनेक स्याम-गुन, कहँ लगि करौं बखानौ ! सूरदास-प्रभु की महिमा अति, साखी बेद पुरानी ॥3॥

Pada 3

काहू के कुल तन न विचारत । अबिगत की गति कहि न परति है, व्याध अजामिल तारत । कौन जाति अरु पाँति बिदुर की, ताही कैं पग धारत । भोजन करत माँगि घर उनकैं, राज मान-मद टारत । ऐसे जनम-करम के ओछनि हूँ ब्यौहारत । यहै सुभाव सूर के प्रभु कौ, भक्त-बछल-पन पारत ॥4॥

Pada 4

सरन गए को को न उबार्‌यौ । जब जब भीर परी संतनि कौं, चक्र सुदरसन तहाँ सँभार्‌यौ । भयौ प्रसाद जु अंबरीष कौं, दुरबासा को क्रोध निवार्‌यौ । ग्वालिन हेत धर्‌यौ गोबर्धन, प्रगट इंद्र कौ गर्ब प्रहार्‌यौ । कृपा करी प्रहलाद भक्त पर, खंभ फारि हिरनाकुस मार्‌यौ । नरहरि रूप धर्‌यौ करुनाकर, छिनक माहिं उर नखनि बिदार्‌यौ । ग्राह ग्रसत गज कौं जल बूड़त, नाम लेत वाकौ दुख टार्‌यौ । सूर स्याम बिनु और करै को, रंग भूमि मैं कंस पछार्‌यौ ॥5॥

Pada 5

स्याम गरीबनि हूँ के गाहक । दीनानाथ हमारे ठाकुर , साँचे प्रीति-निवाहक । कहा बिदुर की जाति-पाँति, कुल, प्रेमी-प्रीति के लाहक । कह पांडव कैं घर ठकुराई ? अरजुन के रथ-बाहक । कहा सुदामा कैं धन हौ ? तौ सत्य-प्रीति के चाहक । सूरदास सठ, तातैं हरि भजि आरत के दुख-दाहक ॥6॥

Pada 6

जैसें तुम गज कौ पाउँ छुड़ायौ । अपने जन कौं दुखित जानि कै पाउँ पियादे धायौ । जहँ जहँ गाढ़ परी भक्तनि कौं, तहँ तहँ आपु जनायौ । भक्ति हेतु प्रहलाद उबार्‌यौ, द्रौपदि-चीर बढ़ायौ । प्रीति जानि हरि गए बिदुर कैं, नामदेव-घर छायौ । सूरदास द्विज दीन सुदामा, तिहिं दारिद्र नसायौ ॥7॥

Pada 7

जापर दीनानाथ ढरै । सोइ कुलीन, बड़ौ सुंदर सोइ, जिहिं पर कृपा करै । कौन विभीषन रंक-निसाचर हरि हँसि छत्र धरै । राजा कौन बड़ौ रावन तैं, गर्बहिं-गर्ब गरै । रंकव कौन सुदामाहूँ तैं आप समान करे । अधम कौन है अजामील तें जम तहँ जात डरै । कौन विरक्त अधिक नारद तैं, निसि-दिन भ्रमत फिरै । जोगी कौन बड़ौ संकर तैं, ताकौं काम छरै । अधिक कुरूप कौन कुबिजा तैं, हरि पति पाइ तरै । अधिक सुरूप कौन सीता तैं, जनम बियोग भरै । यह गति-मति जानै नहिं कोऊ, किहिं रस रसिक ढरै । सूरदास भगवंत-भजन बिनु फिरि फिरि जठर जरै ॥8॥

Pada 8

सगुणोपासनाअविद्या-माया