शैशव-चरित

गोकुल लीला · 11 padas

जसोदा हरि पालनैं झुलावै । हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै । मेरे लाल को आउ निदँरिया, काहैं न आनि सुवावै । तू काहें नहिं बेगहिं आवै, तोकों कान्ह बुलावै । कबहुँक पलक हरि मूँद लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै । सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि, करि-करि सैन बतावै । इहिं अन्तर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरै गावै । जो सुख सूर अमर-मुनि दुरलभ, सो नँद भामिनि पावै ॥1॥

Pada 1

कपट करि ब्रजहिं पूतना आई । अति सुरूप, विष अस्तन लाए, राजा कंस पठाई । मुख चूमति अरु नैन निहारति, राखति कंठ लगाई । भाग बड़े तुम्हरे नन्दरानी, जिहिं के कुँवर कन्हाई । कर गहि छीर पियावति अपनी, जानत केसवराई । बाहर ह्वै कै असुर पुकारी अब बलि लहु छुड़ाई । गइ मुरझाइ, परी धरनी पर, मनी भुवंगम खाई । सूरदास प्रभु तुम्हरी लीला, भक्तनि गाई सुनाई ॥2॥

Pada 2

काग--रूप इक दनुज धर्‌यौ । नृप-आयसु लै धरि माथे पर, हरषवंत उर गरब भर्‌यौ । कितिक बात प्रभु तुम आयुसु तें, वह जानी मो जात मर्‌यौ । इतनी कहि गोकुल उड़ आयौ, आइ नन्द-घर-छाज रह्यौ । पलना पर पौढ़ै हरि देखे, तुरन्त आइ नैननिहिं अर्‌यौ । कंठ चापि बहु बार फिरायौ, गहि पटक्यौ, नृप पास पर्‌यौ । तुरत कंस पूछन तिहिं लाग्यौ, क्यौं आयौ नहिं काज कर्‌यौ । बीतें जाम बोलि तब आयौ, सुनहु कंस, तब आइ सर्‌यौ । धरि अवतार महाबल कोऊ, एकहिं कर मेरी गर्व हर्‌यौ । सूरदास प्रभु कंस-निकंदन, भक्त-हेत अवतार धर्‌यौ ॥3॥

Pada 3

कर पग गहि, अंगूठा मुख मेलत । प्रभु पौढ़े पालनैं अकेले, हरषि-हरषि अपनैं रंग खेलत । सिव सोचत, बिधि बुद्धि विचारत, बट बाढ्यौ सागर-जल झेलत । बिडरि चले घन प्रलय जानि कै, दिगपति दिग दंतीनि सकेलत । मुनि मन भीत भए, भुव कंपित सेष सकुचि सहसौ फन पेलत । उन ब्रज-बासिन बात न जानी, समझे सूर सकट पग ठेलत ॥4॥

Pada 4

महरि मुदित उलटाइ कै मुख चूमन लागी । चिरजीवौ मेरौ लाड़िलौ , मैं भई सभागी । एक पाख त्रय-मास कौ मेरी भयौ कन्हाई । पटकि रान उलटौ पर्‌यौ, मैं, करौं बधाई । नन्द-धरनि आनन्द भरी, बोली ब्रजनारी । यह सुख सुनि आईं सबै, सूरज बलिहारी ॥5॥

Pada 5

जसुमति मन अखिलाष करै । कब मेरौ लाल घुटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै । कब द्वै दाँत दूध के देखीं, कब तोतरैं मुख बचन करै । कब नंदहि बाबा कहि बोलै, कब जननी कहि मोहिं ररै । कब मेरी अँचरा गहि मोहन, जोइ-सोइ कहि मोसौं झगरै । कब धौं तनक-तनक कछु खैहै, अपने कर सौं मुखहिं भरै । कब हँसि बात कहैगो मोसौं, जा छबि तैं दुख दूरि हरै । स्याम अकेले आँगन छाँड़े, आपु गई कछु काज घरै । इहिं अंतर अँधवाह उठ्यो इक, गरजत गगन सहित घहरै । सूरदास ब्रज-लोग सुनत धुनि, जो जहँ-तहँ सब अतिहिं डरै ॥6॥

Pada 6

सुत मुख देखि जसौदा फूली । हरषित देखि दूधि की दँतियाँ, प्रेममगन तन की सुधि भूली । बाहिर तैं तब नंद बुलाए, देखौ धौं सुन्दर सुखदाई । तनक-तनक सी दूध दँतुलिया, देखौ, नैन सफल करी आई । आनँद सहित महर तब आए , मुख चितवत दोउ नैन अघाई । सूर स्याम किलकत द्विज देख्यो, मनौ कमल पर बिज्जु जमाई ॥7॥

Pada 7

हरि किलकत जसुमति की कनियाँ । मुख मैं तीनि लोक दिखराए, चकित भई नद-रनियाँ । घर-घर हाथ दिवावति डोलति, बाँधति गरैं बघनियाँ । सूर स्याम की अद्भुत लीला नहिं जानत मुनिजनियाँ ॥8॥

Pada 8

कान्ह कुँवर की करहु पासनी, कछु दिन घटि षट मास गए । नंद महर यह सुनि पुलकित जिय , हरि अनप्रासन जोग भए । बिप्र बुलाई नाम लै बूझ्यौ, रासि सोधि इक सुदिन धर्‌यौ । आछौ दिन सुनि महरि जसोदा, सखिनि बोलि सुभ गान कर्‌यौ । जुवति महरि कौं गारी गावति, और महर कौ नाम लिए ! ब्रज-घर-घर आनंद बढ्यौ अति, प्रेम पुलक न समान हिए । जाकौं नेति-नेति स्रुति गावत, ध्यावत सुर-मुनि ध्यान धरे । सूरदास तिहिं कौं ब्रज-बनिता, झकझोरति उर अंक भरे ॥9॥

Pada 9

लाल हैं वारी तेरे मुख पर । कुटिल अलक, मोहनि-मन बिहँसनि, भृकुटि विकट ललित नैननि पर । दमकति दूध-दँतुलिया बिहँसत, मनु सीपज घर कियौ बारिज पर । लघु-लघु लट सिर घूँघरवारी, लटकन लटकि रह्यौ माथैं पर । यह उपमा कापै कहि आवै, कछुक कहौं सकुचति हौं जिय पर । नव-तन-चंद्र रेख-मधि राजत, सुरगुरु-सुक्र-उदोत परसपर । लोचन लोल कपोल ललित अति, नासा कौ मुकता रदछद पर । सूर कहा न्यौछावर करिये अपने लाल ललित लरखर पर ॥10॥

Pada 10

उमगिं ब्रजनारि सुभग, कान्ह बरष गाँठि उमंग, चहतिं बरष बरषनि । गावहि मंगल सुगान, नीके सुर नीकी तान, आनँद अति हरषति । कंचन मनि-जटित-थार, रोचन, दधि, फूल-डार,मिलिबे की तरसनि । प्रभु बरष-गाँठि जोरति, वा छवि पर तृन तोरि, सूर अरस परसनि ॥11॥

Pada 11

कृष्ण-जन्मबालगोपाल