कृष्ण-जन्म

गोकुल लीला · 6 padas

आनंदै आनंद बढ्यौ अति । देवनि दिवि दुंदुभी बजाई,सुनि मथुरा प्रगटे जादवपति । विद्याधर-किन्नर कलोल मन उपजावत मिलि कंठ अमित गति । गावत गुन गंधर्व पुलकि तन, नाचतिं सब सुर-नारि रसिक अति । बरषत सुमन सुदेस सूर सुर, जय-जयकार करत, मानत रति । सिव-बिरञ्चि-इन्द्रादिअमर मुनि, फूले सुखन समात मुदित मति ॥1॥

Pada 1

देवकी मन मन चकित भई । देखहु आइ पुत्र-मुख काहे न, ऐसी कहुँ देखी न दई । सिर पर मुकुट, पीत उपरैना, भृगु-पद-उर, भुज चारि धरे । पूरब कथा सुनाइ कही हरि, तुम माँग्यौ इहिं भेष करे । छोरे निगड़, सोआए पहरू, द्वारे की कपाट उधर्‌यौ । तुरत मोहि गोकुल पहुँचावहु, यह कहिकै किसु वेष धर्‌यौ । तब बसुदेव उठे यह सुनतहिं, नँद-भवन गए । बालक धरि, लै सुरदेवी कौं, आइ सूर मधुपुरी ठए ॥2॥

Pada 2

गोकुल प्रगट भए हरि आइ अमर-उधारन, असुर-सँहारन, अंतरजामी त्रिभुवन राइ । माथै धरि बसुदेव जु ल्याए, नंद-महर-घर गए पहुँचाइ । जागी महरि, पुत्र-मुख देख्यौ, पुलकि अंग उर मैं न समाइ । गदगद कंठ, बोल नहिं आवै, हरषवंत ह्वै नंद बुलाइ । आवहु कंत, देव परसन भए, पुत्र भयौ, मुख देखौ धाइ । दौरि नंद गए, सुत-मुख देख्यौ, सो सुख मोपै बरनि न जाइ । सूरदास पहिलैं ही माँग्यौ, दूध पियावत जसुमति माइ ॥3॥

Pada 3

हौं इक नई बात सुनि आई । महरि जसौदा ढोटा जायौ, घर-घर होति बधाई । द्वारैं भीर गोप-गोपिन की, महिमा बरिन न जाई । अति आनन्द होत गोकुल मैं, रतन भूमि अब छाई । नाचत वृद्ध, तरुन अरु बालक, गोरस-कीच मचाई । सूरदास स्वामी सुख-सागर, सुन्दर स्याम कन्हाई ॥4॥

Pada 4

आजु नन्द के द्वारें भीर । इक आवत, इक जात बिदा ह्वै, इक ठाड़े मन्दिर कैं तीर । कोउ केसरि कौ तिलक बनावति, कोउ पहिरति कंचकी सरीर । एकनि कौं गो-दान समर्पत, एकनि कौं पहिरावत चीर । एकनि कौं भूषन पाटंबर; एकनि कौं जु देत नग हीर । एकनि कौं पुहपनि की माला, एकनि कौं चन्दन घसि नीर । एकनि मथैं दूध-रोचना, एकनि कौं बोधति दै धीर । सूरदास धनि स्याम सनेही, धन्य जसोदा पुन्य-सरीर ॥5॥

Pada 5

सोभा-सिन्धु न अन्त रही री । नंद-भवन भरि उमँगि चलि, ब्रज की बीथिन फिरति बही री । देखी जाइ आजु गोकुल मैं, घर-घर बेंचति फिरति दही री । कहँ लगि कहौं बनाइ बहुत विधि, कहत न मुख सहसहुँ निबही री । जसुमति-उदर-अगाध-उदधि तैं उपजी ऐसी सबनि कही री । सूरश्याम प्रभु इंद्र-नीलमनि, ब्रज-बनिता उर लाइ गही री ॥6॥

Pada 6

आत्मज्ञानशैशव-चरित