माखन-चोरी

गोकुल लीला · 31 padas

मैया री, मोहिं माखन भावै । जो मेवा पकवान कहति तू, मोहिं नहीं रुचि आवै । ब्रज-जुवती इक पाछै ठाढ़ी, सुनत श्याम की बात । मन-मन कहति कबहुँ अपनैं घर, देखौं माखन खात । बैठे जाइ मथनियाँ कैं ढिग, मैं तब रहौं छपानी । सूरदास प्रभु अंतरजामीं ग्वालिनि मन की जानी ॥1॥

Pada 1

गए स्याम तिहिं ग्वलिनि कैं घर । देख्यौ द्वार नहीं कोउ, इत-उत चितै चलै तब भीतर । हरि आवत गोपी जब जान्यौ, आपुन रही छपाइ । सूनें सदन मथनियाँ कैं ढिग, बैठि रहे अरगाइ । माखन भरी कमोरी देखत लै-लै लागे खान । चितै रहे मनि-खंभ-छाँह तन, तासौं करत सयान । प्रथम आजु मैं चोरी आयौ, भलौ बन्यौ है संग । आपु खात प्रतिबिंब खवावत, गिरत कहत, का रंग ? जौ चाहौ सब देउँ कमोरी, अति मीठो कत डारत । तुमहि देति मैं अति सुख पायौ, तुम जिय कहा बिचारत । सुनि-सुनि बात स्याम के मुख की उमँगि उठी ब्रजनारी । सूरदास प्रभु निरखि ग्वालि मुख तब भजि चले मुरारी ॥2॥

Pada 2

प्रथम करी हरि माखन-चोरी । ग्वालिनि मन इच्छा करि पूरन, आपु भजे ब्रज खोरी । मन मैं यहै विचार करत हरि, ब्रज घर-घर सब जाऊँ । गोकुल जनम लियौ सुख कारन, सबकैं माखन खाऊँ । बाल-रूप जसुमति मोहिं जानै,गोपनि मिलि सुख भोग । सूरदास प्रभु कहत प्रेम सौं, ये मेरे ब्रज-लोग ॥3॥

Pada 3

गोपालहिं माखन खान दै । सुनि री सखी, मौन ह्वै रहिए, बदन दही लपटान दै । गहि बहियाँ हौं लैके जैहैं, नैननि तपति बुझान दै । याकौ जाइ चौगुनी लैहौं, मोहिं जसुमति लौं जान दै । तू जानति हरि कछू न जानत,सुनत मनोहर कान दै । सूर स्याम ग्वालिनि बस कीन्हीं, राखतिं तन मन प्रान दै ॥4॥

Pada 4

जसुदा कहँ लैं कीजै कानी । दिन-प्रति कैसें सही परति है, दूध-दही की हानि । अपने या बालक की करनी, जौ तुम देखौ आनि । गोरस खाइ, खवावै लरिकिन, भजत भाजन भानि । मैं अपने मंदिर के कोनै, राख्यौ माखन छानि । सोई जाइ तिहारैं ढौटा, लीन्हौ है पहिचानि । बूझि ग्वालि निज गृह मैं आयौ, नैं कु न संका मानि । सूर स्याम यह उतर बनायौ, चींटी काढ़त पानि ॥5॥

Pada 5

आपु गए हरुऐं सूनैं घर । सखा सबै बाहिर ही छाँड़े, देख्यौ दधि-माखन हरि भीतर । तुरत मथ्यौ दधि-माखन पायौ, लै लै खात, धरत अधरनि पर । सैन देइ सब सखा बुलाए, तिनहिं देत भरि-भरि अपनैं कर । छिटकी रही दधि-बूँदि हृदय पर, इत-उत चितवत करि मन मैं डर । उठत ओट लै लखत सबनि कौं , पुनि लै खात ग्वालनि बर । अंतर भई ग्वालि यह देखति मगन भई, अति उर आनंद भरि । सूर स्याम मुख निरखि थकित भई, कहत न बनै, रही मन दै हरि ॥6॥

Pada 6

जान जु पाए हौं हरि नीकैं । चोरि-चोरि दधि माखन मेरी, नित प्रति गीधि रहे हो छीकैं । रोक्यौ भवन-द्वार ब्रज-सुन्दरि, नूपुर मूँदि अचानक ही कै । अब कैसे, जैयतु अपने बल, भाजन भाँजि, दूध दधि पी कै ? सूरदास प्रभु भलैं परे फंद, देउँ न जान भावते जी कैं । भरि गंडुष, छिरकि दै नैननि, गिरिधर भाजि चले दै कीकै ॥7॥

Pada 7

अब ये झूठहु बोलत लोग । पाँच बरष अरु कछुक दिननि कौ, कब भयौ चोरी जोग । इहिं मिस देखन आवति ग्वालिनि, मुँह फाटे जु गँवारि । अनदोषे कौं दोष लगावतिं, दई देइगौ टारि । कैसें करि याकी भुज पहुँची, खौन बेग ह्याँ आयौ ? ऊखल ऊपर आनि, पीठि दै, तापर सखा चढ़ायौ । जौ न पत्याहु चलो सँग जसुमति, देखौ नैन निहारी । सूरदास प्रभु नैकुँ न बरजौ, मन मै महरि विचारी ॥8॥

Pada 8

इन अखियन आगैं तै मोहन, एकौ पल जनि होहु नियारे । हौं बलि गई, दरस देखैं बिनु तलफत है नैननि के तारे । औरों सखा बुलाइ आपने इहिं आँगन खेलौ मेरे बारे । निरखति रहौं फनिग की मनि ज्यौं, सुन्दर बाल-विनोद तिहारे । मधु, मेवा, पकवान, मिठाई व्यंजन खाटे, मीठे खारे । सूर स्याम जोइ-जोइ तुम चाहौ. सोइ-सोइ माँगि लेहु मेरे बारे ॥9॥

Pada 9

चोरी करत कान्ह धरि पाए । निसि-बासर मोहिं बहुत सतायौ अब हरि हाथहिं आए । माखन-दधि मेरौ सब खायौ, बहुत अचगरी कीन्ही । अब तौ घात परे हौ लालन, तुम्हैं भलैं मैं चीन्ही । दोउ भुज पकरि, कह्यौ कहँ जैहौं, माखन लेउँ मँगाइ । तेरी सौं मैं नैकुँ न खायौ, सखा गये सब खाइ । मुख तन चितै, बिहँसि हरि दीन्हौं, रिस तब गई बुझाइ । लियौ स्याम उर लाइ ग्वालिनी, सूरदास बलि जाइ ॥10॥

Pada 10

कान्हहिं बरजति किन नँदरानी । एक गाउँ कैं बसत कहाँ लौं करैं नंद की कानी । तुम जो कहति हौ, मेरो कन्हैया, गंगा कैसौ पानी । बाहिर तरुन किसोर बयस बर, बाट घाट कौ दानी । बचन बिचित्र, कमल-दल-लोचन, कहत सरस बर बानी । अचरज महरि तुम्हारे आगैं अबै जीभ तुतरानी । कहँ मेरौ कान्ह, कहाँ तुम ग्वारिनि, यह बिपरीतिन जानी । आवति सूर उरहने कैं मिस,देखि कुँवर मुसुकानी ॥11॥

Pada 11

मथुरा जाति हौं बेचन दहियौ । मरै घर कौ द्वार, सखी री, तललौं देखति रहियौ । दधि-माखन द्वै माट अछूते तोहिं सौंपति हौं सहियौ । और नहीं या ब्रज मैं कोऊ, नन्द-सुवन सखि लहियौ । ते सब बचन सुने मन-मोहन, वहै राह मन गहियौ । सूर पौरि लौं गई न ग्वालिन, कूद परे दै धहियौ ॥12॥

Pada 12

गए स्याम ग्वालिनि घर सूनैं । माखन खाइ, डारि सब गोरस, फोरि किए सब चूने । बड़ौ माट इक बहुत दिननि कौ, ताहि कर्‌यौ दस टूक । सोवतत लरिकनि छिरकि महीं सौं, हँसत चले दै कूक । आई ग्वालिनि तिहिं औसर, निकसत हरि धरि पाए । देखे घर बासन सब फूटे, दूध दही ढरकाए । दोउ भुज धरि गाढ़ैं करि लीन्हे, गई महरि कै आगै । सूरदास अब बसे कौन ह्याँ, पति रहिहैं ब्रज त्यागैं ॥13॥

Pada 13

करत कान्ह ब्रज-घरिन अचगरी । खीझति महरि कान्ह सौं पुनि-पुनि, उरहन लै आवति हैं सगरी । बड़े बाप के पूत कहावत, हम वै वास बसत इक बगरी । नन्दहु तैं ये बड़े कहैहैं फेरि बसैहैं यह ब्रज नगरी । जननी कैं खीझत हरि रोए, झूठहिं मोहिं लगावति धगरी । सूर स्याम मुख पोंछि जसोदा. कहति सबै जुवती हैं लँगरी ॥14॥

Pada 14

अपनौ गाउँ लेउ नँदरानी । बड़े बाप की बेटी, पूतहि भली पढ़ावति बानी । सखा-भीर लै पैठत घर मैं आपु खाइ तौ सहिऐ । मैं जब चली सामहैं पकरन, तब के गुन कहा कहिऐ । भाजि गए दुरि देखत कतहूँ, मैं घर पौढ़ी आइ । हरैं हरैं बेनी गहि पाछैं, बाँधी पाटी लाइ । सुनु मैया, याके गुन मोसौं, इन मोहिं लयौ बुलाई । दधि मैं पड़ी सेंत की मोपै चीटी सबै कढ़ाई । टहल करत मैं याके घर की यह पति सँग मिलि सोई । सूर बचन सुनि हँसी जसोदा, ग्वाल रही मुख गोई ॥15॥

Pada 15

महरि तें बड़ी कृपन है माई । दूध-दही बहु बिधि कौ दीनौ, सुत सौं धरति छपाई । बालक बहुत नहीं री तेरैं एकै कुँवर कन्हाई । सोऊ तौ घरही घर डोलतु, माखन खात चोराई । वृद्ध बयस, पूरे पुन्यनि तैं, बहुतै निधि पाई । ताहूँ के खैबे-पीबे कौं, कहा करति चतुराई । सुनहुँ न वचन चतुर नागरि के जसुमति नन्द सुनाई । सूर स्याम कौं चोरी कैं मिस देखन है यह आई ॥16॥

Pada 16

अनत सुत गोरस कौं कत जात ? घर सुरभी कारी धौरी कौ माखन माँगि न खात । दिन प्रति सबै उरहने कैं मिस, आवति है उठि प्रात । अनलहते अपराध लगावति, बिकटि बनावतिं बात । निपट निसंक बिबादहिं संमुख, सुनि-सुनि नन्द रिसात । मोसौं कहतिं कृपन तेरैं घर ढौटाहू न अघात । करि मनुहरि उठाइ गोद लै, बरजति सुत कौं मात । सूर स्याम नित उरहनौ, दुख पावन तेरौ तात ॥17॥

Pada 17

हरि सब भाजन फोरि पराने । हाँक देत पैठे दै पेला नैंकु न मनहिं डराने । सींके छोरि, मारि लरकनि कौं, माखन-दधि सब खाई । भवन मच्यौ दधि काँदौ, लरिकन रोवत पाए जाई । सुनहु-सुनहु सबहिनि के लरिका, तैरौ सौ कहुँ नाहिं । हाटनिं-बाटनि, गलिनि कहुँ कोउ चलत नहीं डरपाहिं । रितु आए कौ खेल, कन्हैया सब दिन खेलत फाग । रोकि रहत गहि गली साँकरी, टेढ़ी बाँधत पाग । बारे तैं सुत ये ढंग लाए, मनहीं मनहिं सिहाति । सुनैं सूर ग्वालिनि की बातैं, सकुचि महरि पछिताति ॥18॥

Pada 18

कन्हैया तू नहिं मोहिं डरात । षटरस धरे छाँड़ि कत पर घर, चोरी करि करि खात । बकत-बकत तोसौं पचिहारी, नैंकुहुँ लाज न आई । ब्रज-परगन-सिगदार महर, तू ताकी करत नन्हाई । पूत सपूत भयौ कुल मेरैं, अब मैं जानी बात । सूर स्याम अब लौं तुहिं बकस्यौ, तेरी जानी घात ॥19॥

Pada 19

मैया मैं नहिं माखन खायौ । ख्याल परैं ये सखा सबै मिलि, मेरै मुख लपटायौ । देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचे धरि लटकायौ । हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं मैं कैसें करि पायौ । मुख दधि पोंछि, बुद्धि एक कीन्ही, दोना पीठि दुरायौ । डारि साँटि मुसुकाइ जसोदा, स्यामहिं कंठ लगायौ । बालबिनोद मोद मन मोह्यौ, भक्ति प्रताप दिखायौ । सूरदास जसुमत कौ यह सुख, सिव बिरञ्चि नहिं पायौ ॥20॥

Pada 20

जसुमति तेरौ बारौ कान्ह अतिही जु अचगरौ । दूध-दही माखन लै डारि देत सगरौ । भोरहिं नित प्रतिही उठि, मोसौं करत झगरौ । ग्वाल-बाल संग लिए घेरि रहै डगरौ । हम-तुम सब बैस एक, कातैं को अगरौ । लियौ दियौ सोई कछु, डारि देहु झगरौ । सूर श्याम तेरौ अति, गुननि माहिं अगरौ । चोली अरु हार तोरि, छोरि लियौ सगरौ ॥21॥

Pada 21

ऐसी रिस मैं जौ धरि पाऊँ । कैसे हाल करौं धरि हरि के, तुमकौं प्रकट दिखाऊँ । सँटिया लिए हाथ नँदरानी, थरथरात रिस गात । मारे बिना आजु जौ छाँड़ौं, लागै मेंरैं तात । इहिं अंतर ग्वारिनि इक औरै, धरे बाँह हरि ल्यावति। भली महरि सूधौ सुत जायौ, चोली-हार बतावति । रिस मैं रिस अतिहीं उपजाई, जानि जननि अभिलाष । सूर स्याम भुज गहे जसोदा, अब बाँधौ कहि माष ॥22॥

Pada 22

बाँधौ आजु कौन तोहिं छौरें । बहुत लँगरई कीन्हौं मोसों, भुज गहि रजु ऊखल सौं जोरै । जननी अति रिस लानि बँधायौ, निरखि बदन, लोचन जल ढोरै । यह सुनि ब्रज-जुवतीं सब धाईं कहतिं कान्ह अब गयौं नहिं छौरै । ऊखल सौं गहि बाँधि जसोदा, मारन कौं साँटी कर तोरै । साँटी देखि ग्वालि पछितानी, बिकल भई जहँ-तहँ मुख मोरै । सुनहु महरि ऐसी न बूझिऐ सुत बाँधति माखन दधि थोरैं । सूर स्याम कौं बहुत सतायो, चूक परी हम तैं यह भौरैं ॥23॥

Pada 23

कहा भयौ जौ घर कैं लरिका चोरी माखन खायौ । अहो जसोदा कत त्रासति हौ यहै कोखि को जायौ । बालक अजौं अजान न जानै केतिक दह्यौ लुटायौ । तेरी कहा गयौ ? गोरस कौ गोकुल अंत न पायौ । हा हा लकुट त्रास दिखरावति आँगन पास बँधायौ । रुदन करत दोउ नैन रचे हैं, मनहुँ कमल-कन छायौ । पीढ़ि रहे धरनी पर तिरछैं बिलखि बदन मुरझायौ । सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि , हँसि करि कंठ लगायौ ॥24॥

Pada 24

हलधर सौं कहि ग्वालि सुनायौ । प्रातहिं तैं तुम्हरौ लघु भैया, जसुमति ऊखल बाँधि लगायौ । काहू के लरिकहिं हरि मार्‌यो, भोरहि आनि तिनहिं गुहरायौ । तबहीं तें बाँधे हरि बैठे, सो हम तुमकौं आनि जनायौ । हम बरजी,बरज्यौ नहिं मानति; सुनतहिं बल आतुर ह्वै धायौ । सूर स्याम बैठे ऊखल लगि, माता उर तनु अतिहि त्रसायौ ॥25॥

Pada 25

यह सुनि कै हलधर तहँ धाए । देखि स्याम ऊखल सौं बाँधे, तबहों दोउ लोचन भरि आए । मैं बरज्यौ कै बार कन्हैया, भली करी दोउ हाथ बँधाए । अजहूँ छाँड़ौगे लँगराई, दोउ कर जोर जननि पै आए । स्यामहिं छोरि मोहिं बाँधे बरु, निकसत सगुन मले नहिं पाए । मेरे प्रान-जिवन-धन कान्हा, तिनके भुज मोहिं बँधे दिखाए । माता सौं कह करौं ढिठाई, सो सरूप कहि नाम सुनाए । सूरदास तब कहति जसोदा दोउ भैया तुम इक मत पाए ॥26॥

Pada 26

तबहिं स्याम इक बुद्धि उपाई । जुवती गईं घरनि सब अपनैं, गृह कारज जननी अटकाई । आपु गए जमलार्जुन-तरु-तर, परसत पात उठै झहराई । दिए गिराइ धरनि दोऊ तरु, सुत कुवेर के प्रगटे आई । दोउ कर जोर करत दोउ अस्तुति, चारि भुजा तिन्ह प्रगट दिखाई । सूर धन्य ब्रज जनम लियौ हरि, धरनी की आपदा नसाई ॥27॥

Pada 27

अब घर काहूँ कैंजनि जाहु । तुम्हरैं आजु कमी काहे की,कत तुम अनतहिं खाहु । बरै जेंवरी जिहिं तुम बाँधै, परै हाथ भहराह । नंद मोहिं अतिहीं त्रासत हैं, बाँधँ कुँवर कन्हाइ । रोग जाउ हलधर के, छोरत हो तब स्याम । सूरदास प्रभु खात फिरौ जनि, माखन-दधि तुव धाम॥28॥

Pada 28

भूखौ भयौ आजु मेरी बारौ । भोरहिं ग्वारि उरहनौ ल्याई, उहिं यह कियौ पसारौ । पहिलेहिं रोहिनि सौं कहि राख्यौ, तुरत कर जेवनार । ग्वाल-बाल सब बोलि लिए, मिलि बैठे नन्द-कुमार । भोजन बेगि ल्याउ कछु मैया, भूख लागि मोहि भारी । आजु सबारे कछु नहिं खायौ, सुनत हँसी महतारी । रोहिनी चितै रही जसुमति-तन, सिर धुनि-धुनि पछितानी । परसहु बेगि बेर कत लावति, भूखे साँरगपानी । बहु ब्यंजन बहु भाँति रसोई, षटरस के परकार । सूरस्याम हलधर दोउ भैया, और सखा सब ग्वार ॥29॥

Pada 29

मोहिं कहतिं जुवती सब चोर । खेलत कहूँ रहौं मैं बाहिर, चितै रहतिं सब मेरी ओर । बोलि लेतिं भीतर घर अपनैं, मुख चूमतिं भरि लेतिं अँकोर । माखन हेरि देतिं अपनैं कर कछु कहि बिधि सौं करतिं निहोर । जहाँ मोहिं देखतिं, तहँ टेरतिं, मैं नहिं जात दुहाई तोर । सूर स्याम हँसि कंठ लगायौ, वै तरुनी कहँ बालक मोर ॥30॥

Pada 30

जसुमति कहति कान्ह मेरे प्यारे, अपनैं ही आँगन तुम खेलौ । बोलि लेहु सब सखा संग के, मेरी कह्यौ कबहुँ जिनि पेलौ । ब्रज-बनिता सब चोर कहतिं तोहिं, लाजन सकुचि जात मुख मेरौ । आजु मोहिं बलराम कहत हे, झूठहिं नाम धरति हैं तेरी । जब मोहिं रिस लागति तब त्रासति, बाँधति, मारति जैसें चेरी । सूर हँसति ग्वालिन दे तारी, चोर नाम कैसेहुँ सुत फेरौ ॥31॥

Pada 31

बालगोपालवृंदावन प्रस्थान