महरि-महरि कैं मन यह आई । गोकुल होत उपद्रव दिन प्रति, बसिऐ बृंदावन मैं जाई । सब गोपनि मिलि सकटा साजे, सबहिनि के मन मैं यह भाई । सूर जमुन-तट डेरा दीन्हे, बरष के कुँवर कन्हाई ॥1॥
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वृंदावन लीला · 1 padas
महरि-महरि कैं मन यह आई । गोकुल होत उपद्रव दिन प्रति, बसिऐ बृंदावन मैं जाई । सब गोपनि मिलि सकटा साजे, सबहिनि के मन मैं यह भाई । सूर जमुन-तट डेरा दीन्हे, बरष के कुँवर कन्हाई ॥1॥
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