पनघट लीला

वृंदावन लीला · 7 padas

पनघट रोके रहत कन्हाई । जमुना-जल कोउ भरन न पावै, देखत हीं फिर जाई ॥ तबहिं स्याम इक बुद्धि उपाई, आपुन रहे छपाई । तट ठाढ़े जे सखा संग के, तिनकौं लियौ बुलाई ॥ बैठार्‌यौ ग्वालनि कौंद्रुमतर, आपुन फिर-फिरि देखत । बढ़ी वार भई कोउ न आई, सूर स्याम मन लेखत ॥1॥

Pada 1

जुवति इक आवति देखी स्याम । द्रुम कैं ओट रहै हरि आपुन, जमुना तट गई वाम ॥ जल हलोरि गागरि भरि नागरि, जबहीं सीस उठायौ । घर कौं चली जाइ ता पाछैं, सिर तें घट ढरकायौ ॥ चतुर ग्वालि कर गह्यौ स्याम कौ कनक लकुटिया पाई । औरनि सौं करि रहे अचगरी, मोसौं लगत कन्हाई ॥ गागरि लै हँसि देत ग्वारि-कर, रीतौ घट नहिं लैहौं । सूर स्याम ह्याँ आनि देहु भरि तबहि लकुट कर दैहौं ॥2॥

Pada 2

घट भरि दियौ स्याम उठाइ । नैंकु तन की सुधि न ताकौं, चलौ ब्रज-समुहाइ ॥ स्याम सुंदर नैन-भीतर, रहे आनि समाइ । जहाँ जहँ भरि दृष्टि देखै, तहाँ-तहाँ कन्हाइ ॥ उतहिं तैं इक सखी आई; कहति कहा भुलाइ । सूर अबहीं हँसत आई, चली कहाँ गवाँइ ॥3॥

Pada 3

नीकैं देहु न मेरी गिंडुरी । लै जैहैं धरि जसुमति आगैं, आवहु री सब मिलि झुँड री । काहूँ नहीं डरात कन्हाई, बाट घाट तुम करत अचगरी । जमुना-दह गिंडुरी फटकारी, फौरी सब मटुकी अरु गगरी ॥ भली करी यह कुँवर कन्हाई, आजु मेटहै तुम्हरी लँगरी । चलीं सूर जसुमति के आगैं, उरहन लै ब्रज-तरुनी सगरी ॥4॥

Pada 4

सुनहु महरि तेरौ लाड़िलौ, अति करत अचकरी । जमुन भरन जल हम गईं, तहँ रोकत डगरी ॥ सिरतैं नीर ढराइ दै, फोरी सब गगरी । गेडुरि दई फटकारि कै, हरि करत जु लँगरी ॥ नित प्रति ऐसे ढँग करै, हमसौं कहै धगरी । अब बस-बास बनैं, नहिं इहिं तुव ब्रज-नगरी ॥ आपु गयौ चढ़ि कदम पर, चितवत रहीं सगरी । सूर स्याम ऐसैं हि सदा, हम सौं करै झगरी ॥5॥

Pada 5

ब्रज-घर-घर यह बात चलावत । जसुमति कौ सुत करत अचगरी जमुना जल कोउ भरन न पावत ॥ स्याम वरन नटवर बपु काछे, मुरली राग मलार बजावत । कुंडल-छबि रबि किरनहुँ तैं दुति, मुकुट इंद्र-धनुहुँ तैं भावत ॥ मानत काहु न करत अचगरी, गागरि धरि जल मुँह ढरकावत । सूर स्याम कौं मात पिता दोउ, ऐसे ढँग आपुनहिं पढ़ावत ॥6॥

Pada 6

करत अचगरी नंद महर कौ । सखा लिये जमुना तट बैठ्यौ, निबह न लोग डगर को ॥ कोउ खीझो, कोउ किन बरजौ, जुवतिनि कैं मन ध्यान । मन-बच-कर्म स्याम सुन्दर तजि, और उ जानति आन ॥ यह लीला सब स्याम करत हैं, ब्--रज-जुवतिनि कैं हेत । सूर भजे जिहिं भाव कृष्न कौं, ताकौं सोइ फल देत ॥7॥

Pada 7

रास लीलादान लीला