दान लीला

वृंदावन लीला · 25 padas

ऐसौ दान माँगयै नहिं जौ, हम पैं दियौ न जाइ । बन मैं पाइ अकेली जुवतिनि, मारग रोकत धाइ ॥ घाट बाट औघट जमुना-तट, बातैं कहत बनाइ । कोऊ ऐसौ दान लेत है, कौनैं पठए सिखाइ ॥ हम जानतिं तुम यौं नहिं रैहौ, रहिहौ गारी खाइ । जो रस चाहौ सो रस नाहीं, गोरस पियौ अघाइ ॥ औरनि सौं लै लीजै मोहन, तब हम देहिं बुलाइ । सूर स्याम कत करत अचगरी, हम सौं कुँवर कन्हाइ ॥1॥

Pada 1

ऐसे जनि बोलहु नँद-लाला । छाँड़ि देहु अँचरा मेरौ नीकैं, जानत और सी बाला ॥ बार-बार मैं तुमहिं कहत हौं, परिहौ बहुरि जँजाला । जोबन, रूप देखि ललचाने, अबहीं तैं ये ख्याला ॥ तरुनाई तनु आवन दीजै, कत जिय होत बिहाला । सूर स्याम उर तैं कर टारहु टूटै मोतिनि-माला ॥2॥

Pada 2

तैं कत तोर्‌यौ हार नौ सरि कौ । मोती बगरि रहे सब-बन मैं, गयौ कान कौ तरिकौ ॥ ये अवगुन जु करत गोकुल मैं, तिलक दिये केसरि कौ । ढीठ गुवाल दही कौ मातौ, औढ़नहार कमरि कौ ॥ जाइ पुकारैं जसुमति आगैं, कहति जु मोहन लरिकौ । सूर स्याम जानी चतुराई, जिहिं अभ्यास महुअरि कौ ॥3॥

Pada 3

आपुन भईं सबै अब भोरी । तुम हरि कौ पीतांबर झटक्यौ, उन तुम्हरी मोतिन लर तोरी । माँगत दान ज्बाब नहिं देतीं, ऐसी तुम जोबन की जोरी । डर नहिहँ मानतिं नंद-नँदन कौ, करतीं आनि झकझोरा झोरी ॥ इक तुम नारि गँवारि भली हौ, त्रिभुवन मैं इनकी सरि को री । सूर सुनहु लैहै छँड़ाइ सब, अबहिं फिरौगी दौरी दौरी ॥4॥

Pada 4

हँसत सखनि यह कहत कन्हाई । जाइ चढ़ौ तुम सघन द्रुमनि पर, जहँ तहँ रहौ छपाई ॥ तब लौं बैठि रहौ मुख मूँदे जब जानहु सब आईं । कूदि परौ तब द्रुमनि-द्रुमनि तैं, दै दै नंद-दुहाई ॥ चकित होहिं जैसें जुवती-गन, चरनि जाहि अकुलाई । बेनु-विषान-मुरलि-धुन, कीजौ संख-सब्द घहनाई ॥ नित प्रति जाति हमारैं मारग, यह कहियौ समुझाई । सूर स्याम माखन दधि दानी, यह सुधि नाहिं न पाई ?॥5॥

Pada 5

ग्वारिनि जब देखे नँद-नंदन । मोर मुकुट पीतांबर काछे, खौरि किए तन कंदन ॥ तब यह कह्यौ कहाँ अब जैहौ, आगैं कुँवर कन्हाई । यह सुनि मन आनन्द बढ़ायौ, मुख कहैं, बात डराई ॥ कोउ-कोउ कहति चलौ री जैये, कोउ कहै घर फिर जैयै । कोउ-कोउ कहति कहा करिहैं हरि, इनसौं कहा परैयै ॥ कोउ-कोउ कहति कालिहीं हमकौं, लूटि लई नँद लाल । सूर स्याम के ऐसे गुन हैं, घरहि फिरी ब्रज-बाल ॥6॥

Pada 6

कान्ह कहत दधि-दान न दैहौ ? लैहौं छीनि दूध दधि माखन, देखति ही तुम रैहौ ॥ सब दिन कौ भरि लेउँ आजुहीं, तब छाड़ौं मैं तुमकौ । उघटति हौ तुम मातु-पिता लौं, नहिं जानति हो हमकौ ॥ हम जानति हैं तुमकौ मोहन, लै-लै गोद खिलाए । सूर स्याम अब भय जगाती, वै दिन सब बिसराए ॥7॥

Pada 7

जाइ सबै कंसहि गुहराबहु । दधि माखन घृत लेत छुड़ाए, आजु हजूर बुलावहु ॥ ऐसे कौं कहि मोहिं बतावति, पल भीतर गहि मारौं । मथुरापतिहिं सुनौगी तुमहीं, जब धरि केस पछारौ ॥ बार-बार दिन हमहिं बतावति, अपनौ दिन न विचार्‌यौ । सूर इंद्र ब्रज जबहिं बहावत, तब गिरि राखि उबार्‌यौ ॥8॥

Pada 8

मोसौं बात सुनहु ब्रज-नारी । इक उपखान चलत त्रिभुवन मैं, तुमसौं कहौं उघारी । कबहूँ बालक मुँह न दीजियै, मुँह न दीजियै नारी । जोइ उन करै सोइ करि डारैं, मूँड़ चढ़त हैं भारी । बात कहत अँठिलाति जात सब, हँसति देति कर तारी । सूर कहा ये हमकों जानै, छाँछहिं बेंचनहारी ॥9॥

Pada 9

यह जानति तुम नंदमहर-सुत । धेनु दुहत तुमकौं हम देखतिं, जबहीं जाति खरिकहिं उत ॥ चारी करत यहौं पुनि जानति, घर-घर ढूँढ़त भाँड़े । मारग रोकि गए अब दानी, वे ढँग कब तैं छाँड़े ॥ और सुनौ जसुमति जब बाँधे, तब हम कियौ सहाइ । सूरदास-प्रभु यह जानति हम, तुम ब्रज रहत कन्हाइ ॥10॥

Pada 10

को माता को पिता हमारैं । कब जनमत हमकौ तुम देख्यौ, हँसियत बचन तुम्हारैं ॥ कब माखन चोरी करि खायौ, कब बाँधे महतारी । दुहत कौन की गैया चारत, बात कहौ यह भारी ॥ तुम जानत मोहि नंद-ढुटौना, नंद कहाँ तैं आए । मैं पूरन अबिगत, अबिनासी, माया सबनि भुलाए । यह सुनि ग्वालि सबै मुसुक्यानी, ऐसे गुन हौ जानत । सूर स्याम जो निदर्‌यौ सबहीं, मात-पिता नहिं मानत ॥11॥

Pada 11

भक्त हेत अवतार धरौं । कर्म-धर्म कैं बस मैं नाहीं, जोग जज्ञ मन मैं न करौं ॥ दीन-गुहारि सुनौं स्रवनहि भरि, गर्ब-बचन सुनि हृदय जरौं । भाव-अधिन रहौं सबही कैं, और न काहू नैंकु डरौं । ब्रह्मा कीट आदि लौं ब्यापक, सबकौ सुख दै दुखहिं हरौं । सूर स्याम तब कही प्रगटही, जहाँ भाव तहँ तैं न टरौं ॥12॥

Pada 12

जौ तुमहीं हौ सबके राजा । तो बैठौ सिंहासन चढ़ि कै, चँवर, छत्र, सिर भ्राजा ॥ मोर-मुकुट, मुरली पीतांबर, छाड़ौ नटवर-साजा । बेनु, बिषान, संख क्यौं पूरत, बाजै नौबत बाजा ॥ यह जु सुनैं हमहूँ सुख पावैं संग करैं कछु काजा । सूर स्याम ऐसी बातैं सुनि, हमकौं आवति लाजा ॥13॥

Pada 13

हमहिं और सो रोकै कौन । रोकनहारौ नंदमहर सुत. कान्ह नाम जाकौ है तौन ॥ जाकै बल है काम नृपति कौ, ठगत फिरत जुवतिनि कौं जौन । टोना डारि देत सिर ऊपर, आपुरहत ठाढ़ौ ह्वै मौन ॥ सुनहु स्याम ऐसी न बूझियौ, बानि परी तुमकौं यह कौन । सूरदास-प्रभु कृपा करहु अब, कैसेंहु जाहिं आपनै भौन ॥14॥

Pada 14

राधा सौं माखन हरि माँगत । औरनि की मटुकी कौ खायौ; तुम्हरौ कैसौ लागत ॥ लै आई वृषभानु-सुता, हँसि, सद लवनी है मेरी । लै दीन्हौं अपनँ कर हरि-मुख, खात अल्प हँसि हेरी ॥ सबहिनि तैं मीठी दधि है यह, मधुरैं कह्यौ सुनाइ । सूरदास-प्रभु सुख उपजायौ, ब्रज ललना मनभाइ ॥15॥

Pada 15

मेरे दधि को हरि स्वाद न पायौ । जानत इन गुजरिनि कौ सौ है, लयौ छिड़ाइ मिलि ग्वालनि खायौ ॥ धौरी धेनु दुहाइ छानि पय, मधुर आँचि मैं आँटि सिरायौ । नई दोहनी पोंछि पखारी, धरि निरधूम खिरनि पै तायौ ॥ तामैं मिलि मिस्रित मिसिरी करि, दै कपूर पुट जावन नायौ । सुभग ढकनियाँ ढाँकि बाँधि पट, जतन राखि छीखैं समुदायौ ॥ हौं तुम कारनलै आई गृह, मारग मैं न कहूँ दरसायौ । सूरदास-प्रभु रसिक-सिरोमनि, कियौ कान्ह ग्वालिनि मन भायौ ॥16॥

Pada 16

गोपी कहति धन्य हम नारी । धन्य दूध, धनि दधि, धनि माखन, हम परुसति जेंवत गिरधारी ॥ धन्य घोष, धनि दिन, धनि निसि वह, धनि गोकुल प्रगटे बनवारी । धन्य सुकृत पाँछिलौ, धन्य धनि नँद, धन्य जसुमति महतारी । धन्य दान, धनि कान्ह मँगैया, सूर त्रिन -द्रुम बन-डारी ॥17॥

Pada 17

गन गंधर्व देखि सिहात । धन्य ब्रज-ललनानि कर तैं, ब्रह्म माखन खात ॥ नहीं रेख, न रूप, नहीं तनु बरन नहिं अनुहारी । मातु-पितु नहिं दोउ जाकैं, हरत-मरत न जारि ॥ आपु कर्त्ता आपु हर्त्ता, आपु त्रिभुवन नाथ । आपुहीं सब घट कौ ब्यापी, निगम गावत गाथ ॥ अंग प्रति-प्रति रोम जाकै, कोटि-कोटि ब्रह्मंड । कीट ब्रह्म प्रजंत जल-थल, इनहिं तें नह मंड ॥ येइ विस्वंभरनि नायक, ग्वाल-संग-बिलास । सोइ प्रभु दधि दान माँगत, धन्य सुरजदास ॥18॥

Pada 18

ब्रह्म जिनहिं यह आयसु दीन्हौ । तिन तिन संग जन्म लियौ परगट, सखी सखा करि कीन्हौ ॥ गोपी ग्वाल कान्ह द्वै नाहीं, ये कहुँ नैंकु न न्यारे । जहाँ जहाँ अवतार धरत हरि, ये नहिं नैंकु बिसारे ॥ एकै देह बहुत करि राखे, गोपी ग्वाल मुरारी । यह सुख देखि सूर के प्रभु कौं, थकित अमर-सँग-नारी ॥19॥

Pada 19

यह महिमा येई पै जानैं । जोग-यज्ञ-तप ध्यान न आवत, सो दधि-दान लेत सुख मानैं ॥ खात परस्पर ग्वालनि मिलि कै, मीठौ कहि कहि आपु बखानैं । बिस्वंभर जगदीस कहावत, ते दधि दोना माँझ अघाने ॥ आपुहिं करता, आपुहिं हरता, आपु बनावत आपुहिं भानै । ऐसे सूरदास के स्वामी, ते गोपिन कै हाथ बिकाने ॥20॥

Pada 20

सुनहु बात जुवती इक मेरी । तुमतैं दूरि होत नहिं कबहूँ, तुम राख्यौ मोहिं घेरी ॥ तुम कारन बैकुंठ तजत हौं, जनम लेत ब्रज आइ । वृंदावन राधा-गोपी संग, यहि नहिं बिसर्‌यौ जाइ ॥ तुम अंतर-अंतर कह भाषति, एक प्रान द्वै देह । क्यौं राधा ब्रज बसैं बिसारौं, सुमिरि पुरातन नेह ॥ अब घर जाहु दान मैं पायौ, लेखा कियौ न जाइ । सूर स्याम हँसि-हँसि जुबतिनि सौं ऐसी कहत बनाइ ॥21॥

Pada 21

तुमहिं बिना मन धिक अरु धिक घर । तुमहिं बिना धिक-धिक माता पितु, धिक कुल-कानि, लाज, डर ॥ धिक सुत पति, धिक जीवन जग कौ, धिक तुम बिनु संसार । सूरदास प्रभु तुम बिनु घर ज्यौं, बन-भीतर के कूप ॥22 ॥

Pada 22

रीती मटुकी सीस धरैं ॥ बन की घर को सुरति न काहूँ, लेहु दही या कहति फिरैं । कबहुँक जाति कुंज भीतर कौं, तहाँ स्याम की सुरति करैं । चौंकि परतिं, कछु तन सुधि आवति, जहाँ तहाँ सखि सुनति ररैं ॥ तब यह कहती कहाँ मैं इनसौं, भ्रमि भ्रमि बन मैं बृथा मरैं । सूर स्याम कैं रस पुनि छाकतिं, बैसैं हीं ढँग बहरि ढरैं ॥23॥

Pada 23

तरुनी स्याम-रस मतवारि । प्रथम जोबन-रस चढ़ायौ, अतिहि भई खुमारि ॥ दूध नहिं, दधि नहीं, माखन नहीं, रीतौ माट । महा-रस अंग-अंग पूरन, कहाँ घर, कहँ बाट ॥ मातु-पितु गुरुजन कहाँ के, कौन पति, को नारि । सूर प्रभु कैं प्रेम पूरन, छकि रहीं ब्रजनारि ॥24॥

Pada 24

कोउ माई लैहै री गोपालहिं । दधि कौ नाम स्यामसुंदर-रस, बिसरि गयौ ब्रज-बालहिं ॥ मटुकी सीस, फिरति ब्रज-बीथिनि, बोलति बचन रसालहिं । उफनत तक्र चहुँ दिसि चितवत, चित लाग्यौ नँद-लालहिं ॥ हँसति, रिसाति, बुलावति, बरजति देखहु इनकी चालहिं । सूरे स्याम बिनु और न भावै, या बिरहनि बेहालहिं ॥25॥

Pada 25

पनघट लीलागोपिका अनुराग