गोपिका अनुराग

वृंदावन लीला · 9 padas

लोक-सकुच कुल-कानि तजौ । जैसैं नदी सिंधु कौं धावै वैसैंहि स्याम भजी ॥ मातु पिता बहु त्रास दिखायौ, नैकुँ न डरी, लजी । हारि मानि बैठे, नहिं लागति, बहुतै बुद्धि सजी ॥ मानति नहीं लोक मरजादा, हरि कैं रंग मजी । सूर स्याम कौं मिलि, चूनौ-हरदी ज्यौं रंग रँजी ॥1॥

Pada 1

कहा कहति तू मोहिं ,री माई । नंद-नँदन मन हरि लियो मेरौ, तब तैं मोकौं कछु न सुहाई ॥ अब लौं नहिं जानति मैं को ही, कब तैं तू मेरैं ढिग आई । कहाँ गेह, कहँ मातु पिता हैं, कहाँ सजन, गुरुजन कहँ भाई ॥ कैसी लाज, कानि है कैसी, कहा कहति ह्वै ह्वै रिसहाई ?। अब तौ सूर भजी नँद-लालहिं, की लघुता की होइ बड़ाई ॥2॥

Pada 2

मेरे कहे मैं कोउ नाहिं । कह कहौं, कछु कहिन आवै, नैं कुहुँ न डराहिं ॥ नैन ये हरि-दरस-लोभी, स्रवन सब्द-रसाल । प्रथमहीं मन गयौ तन तजि, तब भई बेहाल ॥ इंद्रियनि पर भूप मन है, सबनि लियौ बुलाइ । सूर प्रभु कौं मिले सब ये, मोहिं करि गए बाइ ॥3॥

Pada 3

अब तौ प्रगट भई जग जानी वा मोहन सौं प्रीति निरंतर, क्यौंऽब रहैगौ छानी ॥ कहा करौं सुंदर मूरति, इन नैननि माँझ समानी । निकसति नहीं बहुत पचि हारी, रोम-रोम अरुझानी ॥ अब कैसैं निरवारि जाति है, मिली दूध ज्यौं पानी । सूरदास प्रभु अंतरजामी, उर अंतर की जानी ॥4॥

Pada 4

सखि मोहिं हरिदरस रस प्याइ । हौं रँगी अब स्याम-मूरति, लाख लोग रिसाइ ॥ स्यामसुंदर मदन मोहन, रंग-रूप सुभाइ । सूर स्वामी-प्रीति-कारन, सीस रहौ कि जाइ ॥5॥

Pada 5

नंदलाल सौं मेरौ मन मान्यौ, कहा करैगौ कोउ । मैं तौ चरन-कमल लपटानी, जो भावै सो होउ ॥ बाप रिसाइ, माइ घर मारै, हँसै बिराने लोग । अब तौ स्यामहिं सौं रति बाढ़ी, बिधना रच्यौ सँजोग ॥ जाति महति पति जाइ न मेरी, अरु परलोक नसाइ । गिरधर बर मैं नैंकु न छाँड़ौ, मिली निसान बजाइ ॥ बहुरि कबहिं यह तन धरि पैहौं, कहँ पुनि श्री बनवारि । सूरदास स्वामी कैं ऊपर यह तन डारौं वारि ॥6॥

Pada 6

करन दै लोगनि कौं उपहास । मन क्रम बचन नंद-नंदन कौ, नैकु न छाड़ौं पास ॥ सब या ब्रज के लोग चिकनियाँ, मेरे भाऐं घास । अब तौ यहै बसी री माई, नहिं मानौं गुरु त्रास ॥ कैसैं रह्यौ परै री सजनी,एक गाँव कै बास । स्याम मिलन की प्रीति सखी री, जानत सूरजदास ॥7॥

Pada 7

एक गाउँ कै बास सखी हौं, कैसै धीर धरौं । लोचन-मधुप अटक नहिं मानत, जद्यपि जतन करौं ॥ वै इहिं मग नित प्रति आवत है, हौं दधि लै निकरौं । पुलकित रोम रोम, गद-गद सुर, आनँद उमँग भरौं ॥ पर अंतर चलि जात, कलप बर बिरहा अनल जरौं । सूर सकुच कुल-कानि कहाँ लगि, आरज-पथहिं डरौं ॥8॥

Pada 8

हौं सँग साँवरे के जैहौ । होनी होइ होइ सो अबहीं, जस अपजस काहूँ न डरैहौं ॥ कहा रिसाइ करे कोउ मेरौं, कछु जो कहै प्रान तिहिं दैहौं । देहौ त्यागि राखिहौं यह ब्रत, हरि-रति बीज बहुरि कब बैहौं ॥ का यह सूर अचिर अवनी, तनु तजि अकास पिय-भवन समैहौं । का यह ब्रज-बापी क्रीड़ा जल, भजि नँद-नँद सुख लैहौं ॥9॥

Pada 9

दान लीलारूप-वर्णन