नेत्र अनुराग

वृंदावन लीला · 12 padas

नैन न मेरे हाथ रहै । देखत दरस स्याम सुंदर कौ, जल की ढरनि बहे ॥ वह नीचे कौं धावत आतुर , वैसेहि नैन भए । वह तौ जाइ समात उदधि मैं, ये प्रति अंग रए ॥ यह अगाध कहुँ वार पार नहिं, येउ सोभा नहिं पार ॥ लोचन मिले त्रिबेनी ह्वैकै, सूर समुद्र अपार ॥1॥

Pada 1

इन नैननि मोहिं बहुत सतायौ । अब लौं कानि करी मैं सजनी, बहुतै मूँड़ चढ़ायौ ॥ निदरे रहत गहे रिस मोसौं, मोहिं दोष लगायौ । लूटत आपुन श्री-अंग सोभा, ज्यौं निधनी धन पायौ ॥ निसिहूँ दिन ये करत अचकरी, सुनहिं कहा धौं आयौ । सुनहु सूर इनकौं प्रतिपालत, आलस नैंकु न लायौ ॥2॥

Pada 2

नैन करैं सुख, हम दुख पावै । ऐसौ को पर-बेदन जानै, जासौं कहि जु सुनावैं ॥ तातैं मौन भलौ सबही तैं, कहि कै मान गँवावैं। लोचन, मन, इंद्री हरि कौं भति, तजि हमकौं सुख पावैं ॥ वै तौ गए आपने कर तैं, वृथा जीव भरमावैं । सूर स्याम हैं चतुर सिरोमनि , तिनसौं भेद जनावैं ॥3॥

Pada 3

ऐसे आपुस्वारथी नैन । अपनोइ पेट भरत हैं निसि-दिन, और न लैन न दैन ॥ बस्तु अपार परी ओछैं कर, ये जानत घटि जैहैं । को इनसैं समुझाइ कहै यह, दीन्हैं हों अधिकैहैं ॥ सदा नहीं रैहैं अधिकारी, नाउ राखि जौ लेते । सूर स्याम सुख लूटैं आपुन, औरनि हूँ कौं देते ॥4॥

Pada 4

नैन भए बस मोहन तैं । ज्यौं कुरंग बस होत नाद के, टरत नहीं ता गोहन तैं ॥ ज्यौं मधुकर बस कमल-कोस के, ज्यौं बस चंद चकोर । तैसेंहि ये बस भए स्याम के, गुड़ी-बस्य ज्यौं डोर ॥ ज्यौं बस स्वाति-बूँद के चातक, ज्यौं बस जल के मीन । सूरज-प्रभु के बस्य भए ये , छिनु-छिनु प्रीति नवीन ॥5॥

Pada 5

तब तैं नैन रहे इकटकहीं । जब तैं दृष्टि परे नँद-नंदन, नैंकुन अंत मटकहीं । मुरली घरे अरुन अधरनि पर, कुंडल झलक कपोल । निरखत इकटक पलक भुलाने, मनौ बिकाने मोल ॥ हमकौं वै काहै न बिसारैं, अपनी सुधि उन नाहिं । सूर स्याम-छबि-सिंधु समाने, बृथा तरुनि पछिताहिं ॥6॥

Pada 6

नैननि सौं झगरी करिहौं री । कहा भयौ जौ स्याम-संग हैं, बाँह पकरि सम्मुख लरिहै री ॥ जन्महिं तैं प्रतिपालि बड़े किये, दिन-दिन कौ लेखौ करिहौं री । रूप-लूट कीन्ही तुम काहै, अपने बाँटै कौं धरिहौं री ॥ एक मातु पितु भवन एक रहे, मैं काहैं उनकौं डरिहौं री । सूर अंस जो नहीं देहिगे, उनकें रंग मैं हूँ ढरिहौं री ॥7॥

Pada 7

कपटी नैननि तैं कोउ नाहीं । घर कौ और के आगैं, क्यौं कहिबे कौं जाहीं ॥ आपु गए निरधक ह्वै हमतें, बरजि-बरजि पचिहारी । मदकामना भई परिपूरन, ढरि रीझे गिरिधारी । इनहिं बिना बे, उनहिं बिना ये, अंतर नाहीं भावत । सूरदास यह जुग की महिमा, कुटिल तुरत फल पावत ॥8॥

Pada 8

नैना घूँघट मैं न समात । सुंदर बदन नंद-नंदन कौ, निरखि-निरखि न अघात ॥ अति रस-लुब्ध महा लंपट, जानत एक न बात । कहा कहौं दरसन-सुख माते, ओट भएँ अकुलात ॥ बार-बार बरजत हौं हारी तऊ टेव नहिं जात । सूर तनक गिरिधर बिनु देखै, पलक कलप सम जात ॥9॥

Pada 9

वे नैना मेरे ढीठ भए री । घूँघट-ओट रहत नहिं रौकैं, हरि-मुख देखत लोभि गए री ॥ जउ मैं कोटि जतन करि राखे, पलक-कपाटनि मूँदि लए री । तउ ते उमँगि चले दोउ हठ करि, करौं कहा मैं जान दए री ॥ अतिहिं चपल, बरज्यौ नहिं मानत, देखि बदन तन फेरि नए री । सूर स्यामसुंदर-रस अटके, मानहुँ लोभी उहँइ चए री ॥10॥

Pada 10

अँखियाँ हरि कैं हाथ बिकानीं । मृदु मुसुकानि मोल इनि लीन्ही, यह सुनि सुनि पछितानी । कैसैं रहति रहीं मेरैं बस, अब कछु औरै भाँति । अब वै लाज मरतिं मोहिं देखत, बैठीं मिलि हरि-पाँति ॥ सपने की सि मिलनि करति हैं, कब आवतिं कब जातिं । सूरमिली ढरि नँद-नंदन कौं, अनत नहीं पतियातिं ॥11॥

Pada 11

अँखियनि तब तें बैर धर्‌यौ । जब हम हटकी हरि-दरसन कौं, सो रिस नहिं बिसर्‌यौ ॥ तबही तै उनि हमहिं भुलायौ, गईं उतहिं कौं धाइ । अब तौं तरकि तरकि ऐंठति है; लेनी लेतिं बनाइ ॥ भईं जाइ वै स्याम-सुहागिनि, बड़भागिनि कहवावैं । सूरदास वैसी प्रभुता तजि, हम पै कब वै आवैं ॥12॥

Pada 12

रूप-वर्णनप्रथम मिलन