प्रथम मिलन

राधा-कृष्ण · 10 padas

खेलत हरि निकसै ब्रज-खोरी कटि कछनी पीतांबर बाँधे, हाथ लिये भौंरा,चक, डोरी ॥ मोर-मुकुट, कुंडल स्रवननि बर, बसन-दमक दामिनि-छबि छोरी । गए स्याम रबि-तनया कैं तट, अंग लसति चंदन की खोरी ॥ औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दिये रोरी । नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी । संग लरिकिनी चलि इत आवति, दिन-थोरी, अति छबि तन-गोरी । सूर स्याम देखत हीं रीझे, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी ॥1॥

Pada 1

बूझत स्याम कौन तू गौरी । कहाँ रहति,काकी है बेटी, देखी नहीं कहूँ ब्रज खोरी ॥ काहे कौं हम ब्रज-तन आवतिं, खेलति रहतिं आपनी पौरी । सुनत रहतिं स्रवन नँद-ढोटा, करत फिरत माखन-दधि-चोरी ॥ तुम्हरौ कहा चोरि हम लैहैं, लेखन चलौ संग मिलि जोरी । सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी ॥2॥

Pada 2

प्रथम सनेह दुहुँनि मन जान्यौ । नैन नैन कीन्ही सब बातें, गुप्त प्रीति प्रगटान्यौ ॥ खेलन कबहुँ हमरै आवहु,नंद-सदन, ब्रज गाउँ ॥ द्वारैं आइ टेरि मोहिं लीजौ, कान्ह हमारौ नाउँ ॥ जौ कहियै घर दूरि तुम्हारौ, बोलत सुनियै टेरि । तुमहिं सौंह बृषभानु बबा की, प्रात-साँझ इक फेरि ॥ सूधी निपट देखियत तुमकौं, तातैं करियत साथ । सूर स्याम नागर-उत नागरि, राधा दोउ मिलि गाथ ॥3॥

Pada 3

गई वतषभानु-सुता अपनैं घर । संग सखी सौं कहति चली यह, लको जैहैं इनकें दर । बड़ी बैर भई जमुना आए , खीझति ह्वैं है मैया । बचन कहति मुख, हृदय-प्रेम-दुख, मन हरि लियौ कन्हैया ॥ माता कहति कहाँ ही प्यारी, कहाँ अबेर लगाई । सूरदास तब कहति राधिका, खरिक देखि हौं आई ॥4॥

Pada 4

नंद गए खरिकहिं हरि लीन्हें ॥ देखी तहाँ राधिका ठाढ़ी, बोली लिए तिहिं चीन्हे ॥ महर कह्यौ खेलौ तुम दोऊ, दूरि कहूँ जिनि जैहौ । गनती करत ग्वाल गैयनि की, मोहिं नियरैं तुम रैहो ॥ सुनि बेटी वृषभानु महर की, कान्हहिं लेइ खिलाइ । सूर स्याम कौं देखे रहिहो, मारै जनि कोउ गाइ ॥5॥

Pada 5

नंद बबा की बात सुनौ हरि । मोहिं छाँड़ि जौ कहूँ जाहुगे, ल्याउँगी तुमकौं धरि ॥ भली भई तुम्हैं सौंपि गए मोहिं, जान न देहौं तुमकौं । बाँह तुम्हरी नैंकु न छाँड़ौ, महर खीझिहैं हमकौं ॥ मेरी बाँह छाँड़ी दै राधा , करत उपरफट बातैं । सूर स्याम नागरि सौं, करत प्रेम की घातैं ॥6॥

Pada 6

खेलन कैं मिस कुँवरि राधिका, नंद-महरि कै आई (हो) । सकुच सहित मधुरे करि बोली, घर हो कुँवर कन्हाई (हो) ॥ सुनत स्याम कोकिल सम बानी, निकसे अति अतुराई (हो) । माता सौं कछु करत कलह हे, रिस डारी बिसराई (हो) ॥ मैया री तू इनकौं चीन्हति, बारंबार बताई (हो) । जमुना-तीर काल्हि मैं भूल्यौ, बाँह पकरि लै आई (हो) ॥ आवति इहाँ तोहिं सकुचति है, मैं दै सौंह बुलाई (हो) । सूर स्याम ऐसे गुन-आगर, नागरि बहुत रिझाई (हो) ॥7॥

Pada 7

नाम कहा तेरो री प्यारी । बेटी कौन महर की है तू, को तेरी महतारी ॥ धन्य कोख जिहिं राख्यौ, घनि धरि जिहिं अवतारी । धन्य पिता माता तेरे, छवि निरखति हरि-महतारी ॥ मैं बेटी बृषभानु महर की, मैया तुमकौं जानति । जमुना-तट बहु बार मिलन भयौ, तुम नाहिंन पहिचानतिं ॥ ऐसी कहि, वाकौं मैं जानति, वह तो बड़ी छिनारि । महर बड़ौ लंगर सब दिन कौ, हँसति देति मुख गारि ॥ राधा बोल उठी, बाबा कछु तुमसौं ढीठी कीन्हौ । ऐसे समरथ कब मैं देखे, हँसि प्यारिहि उर लीन्ही ॥ महरि कुँवरि सौं यह भारति आउ करौं तेरी चोटी । सूरदास हरषित नँदरानी, कहति महरि हम जोटी ॥8॥

Pada 8

जसुमति राधा कुँवरि सँवारति । बड़े बार सीमंत सीस के, प्रेम सहित निरुवारति । माँग पारि बेनी जु सँवारति गूँथी सुंदर भाँति । गोरैं भाल बिंदु बदन, मनु इंदु प्रात-रवि काँति ॥ सारी चीरि नई फरिया लै, अपने हाथ बनाइ । अंचल सौं मुख पोंछि अंग सब, आपुहि लै पहिराइ ॥ तिल चाँवरी, बतासे, मेवा, दियौ कुँवरि की गोद । सूर स्याम-राधा तनु चितवत, जसुमति मन-मन मोद ॥9॥

Pada 9

बूझति जननि कहाँ हुती प्यारी । किन तेरे भाल तिलक रचि कीनी, किहिं कच गूँदि माँग सिर पारी । खेलति रही नंद कैं आँगन जसुमति कही कुँवरि ह्याँ आ री । मेरौ नाउँ बूझि बाबा कौ, तेरौ बूझि दई हँसि गारी ॥ तिल चावरी गोद करि दीनी, फरिया दई फारि नव सारी । मो तन चितै, चितै ढौटा-तन कछु सबिता सों गोद पसारी ॥ यह सुनि कै वृषभानु मुदित चित, हँसि-हँसि बूझत बात दुलारी । सूर सुनत रस-सिंधु बढ्‌यौ अति , दंपति एकै बात बिचारी ॥10॥

Pada 10

नेत्र अनुरागगारुड़ी कृष्ण