कमरी

वृंदावन लीला · 2 padas

धनि धनि यह कामरी मोहन स्याम की । यहै ओढ़ि जात बन, यहै सेज कौ बसन, यहै निवारिनि मेहबूँद छाँह घाम की । याही ओट सहत सिसिर-सीत, याहीं गहने हरत, लै धरत ओट कोटि बाम की । यहै जाति-पाँति, परिपाटी यह सिखवत, सूरज प्रभु के यह सब बिसराम की ॥1॥

Pada 1

यह कमरी कमरी करि जानति । जाके जितनी बुद्धि हृदय मैं, सौ तितनौ अनुमानति ॥ या कमरी के एक रोम पर, वारी चीर पटंबर । सो कमरी तुम निंदति गोपी, जो तिहुँ लोक अडंबर ॥ कमरी कैं बल असुर सँहारे, कमरिहिं तैं सब भोग । जाति-पाँति कमरी सब मेरी, सूर सबै यह जोग ॥2॥

Pada 2

मुरलीचीर-हरन