चीर-हरन

वृंदावन लीला · 8 padas

भवन रवन सबही बिसरायौ । नंद-नँदन जब तैं मन हरि लियौ, बिरथा जनम गँवायौ ॥ जप, तप व्रत, संजम, साधन तैं, द्रवित होत पाषान । जैसैं मिलै स्याम सुंदर बर, सोइ कीजै, नहिं आन । यहै मंत्र दृढ़ कियौ सबनि मिलि, यातैं होइ सुहोइ । वृथा जनम जग मैं जिनि खौवहु, ह्याँ अपनौ नहिं कोइ ॥ तब प्रतीत सबहिनि कौं आई, कीन्हौं दृढ़ विस्वास । सूर स्यामसुंदर पति पावैं, यहै हमारी आस ॥1॥

Pada 1

जमुना तट देखे नँद नंदन । मोर-मुकुट मकराकृत-कुंडल, पीत-वसन तन चंदन ॥ लोचन तृप्त भए दरसन तैं, उर की तपति बुझानी । प्रेम-मगन तब भई सुंदरी, उर गदगद, मुख-बानी ॥ कमल-नयन तट पर हैं ठाढ़े, सकुचहिं मिलि ब्रज-नारी । सूरदास-प्रभु अंतरजामी, ब्रत-पूरन पगधारी ॥2॥

Pada 2

बनत नहिं जमुना कौ ऐबौ । सुंदर स्यामघाट पर ठाढ़े, कहौ कौन बिधि जैबी ॥ कैसें बसन उतारि धरैं हम, कैसैं जलहिं समैबौ । नंद-नँदन हमकौं देखैंगे, कैसै करि जु अन्हैबौ ॥ चोली, चीर , हार लै भाजत, सो कैसैं करि पैबी । अंकन भरि-भरि लेत सूर प्रभु, काल्हि न इहिं पथ ऐबौ ॥3॥

Pada 3

नीकैं तप कियौ तनु गारि । आपु देखत कदम पर चढ़ी, मानि लियौ मुरारि ॥ वर्ष भर ब्रत-नेम-संजम, स्रम कियौ मोहिं काज । कैसै हूँ मोहिं भजै कोऊ, मोहिं बिरद की लाज ॥ धन्य ब्रत इन कियौ पूरन, सीत तपति निवारि । काम-आतुर भजीं ,मोकौ, नव तरुनि ब्रज-नारि ॥ कृपा-नाथ कृपाल भए तब, जानि जन की पीर । सूर प्रभु अनुमान कीन्हौ, हरौं इनके चीर ॥4॥

Pada 4

बसन हरे सब कदम चढ़ए । सोरह सहस गोप-कन्यनि के, अंग अभूषन सहित चुराए ॥ नीलांबर, पाटंबर, सारी, सेत पीत चुनरी, अरुनाए । अति बिस्तार नोप तरु तामै लै लै जहाँ-तहाँ लटकाए ॥ मनि-आभरन डार डारनि प्रति, देखत छबि मनहीं अँटकाए ॥ सूर,स्याम जु तिनि ब्रत पूरन, कौ फल डारनि कदम फराए ॥5॥

Pada 5

हमारे अंबर देहु मुरारी । लै सब चोर कदम चढ़ि बैठे, हम जल-माँझ उघारी ॥ तट पर बिना बसन क्यौं आवैं ,लाज लगति है भारी । चोली हार तुमहिं कौं दीन्हौं, चीर हमहिं द्यौ डारी ॥ तुम यह बात अचंभौ भाषत,नाँगी आवहु नारी । सूर स्याम कछु छोह करौ जू, सीत गई तनु मारी ॥6॥

Pada 6

लाज ओट यह दूरि करौ । जोइ मैं कहौं करौ तुम सोई, सकुच बापुरिहि कहा करौ ॥ जल तैं तीर आइ कर जोरहु, मैं देखौं तुम बिनय करौ । पूरन ब्रत अब भयौ तुम्हारौ, गुरुजन संका दूरि करौ । अब अंतर मोसौं जनि राखहुँ , बार बार हठ वृथा करौ । सूर स्याम कहैं चीर देत हौं, मौ आगैं सिंगार करौ ॥7॥

Pada 7

ब्रत पूरन कियौ नंदकुमार । जुवतिनि के मेटे जंजार ॥ जप तप करि तनु अब जनि गारौ । तुम घरनी मैं कंत तुम्हारौ ॥ अंतर सोच दूरि करि डारौ । मेरौ कह्यौ सत्य उर धारौ ॥ सरद-रास तुम आस पुराऊँ । अंकन भरि सबकौं उर लाऊँ ॥ यह सुनि सब मन हरष बढ़ायौ । मन-मन कह्यौ कृष्न पति पायौ ॥ जाहु सबै घर घोष-कुमारी । सरद-रास देहौं सुख भारी ॥ सूर स्याम प्रगटे गिरिधारी । आनँद सहित गईं घर नारी ॥8॥

Pada 8

कमरीगोवर्द्धनधारण