गोवर्द्धनधारण

वृंदावन लीला · 15 padas

बाजति नंद-अवास बधाई । बैठे खेलत द्वार आपनैं, सात बरस के कुँवर कन्हाई ॥ बैठे नंद सहित वृषभानुहिं, और गोप बैठे सब आई । थापैं देत घरिन के द्वारैं, गावतिं मंगल नारि बधाई ॥ पूजा करत इंद्र की जानी, आए स्याम तहाँ अतुराई । बार-बार हरि बूझत नंदहिं , कौन देव की करत पुजाई ॥ इंद्र बड़े कुल-देव हमारे, उनतैं सब यह होति बड़ाई । सूर स्याम तुम्हरे हित कारन, यह पूजा करत सदाई ॥1॥

Pada 1

मेरौ कह्यो सत्य करि जानौ ॥ जौ चाहौ ब्रज की कुसलाई, तौ गोबर्धन मानौ ॥ दूध दही तुम कितनौ लैहौ, गोसुत बढ़ैं अनेक । कहा पूजि सुरपति सैं पायौ, छाँड़ि देहु यह टेक ॥ मुँह माँगे फल जौ तुम पावहु, तो तुम मानहु मोहिं । सूरदास प्रभु कहत ग्वालसौं, सत्य बचन करि दोहि ॥2॥

Pada 2

बिप्र बुलाइ लिए नँदराइ । प्रथमारंभ जज्ञ कौ कीन्हौ, उठे बेद-धुनि गाइ ॥ गोबर्धन सिर तिलक चढ़ायौ, मेटि इंद्र ठकुराइ । अन्नकूट ऐसौ रचि राख्यौ, गिरि की उपमा पाइ ॥ भाँति-भाँति ब्यंजन परसाए, काँपै बरन्यौ जाइ । सूर स्याम सौं कहत ग्वाल, गिरि जेवहिं कहौ बुझाइ ॥3॥

Pada 3

गिरिवर स्याम की अनुहारि । करत भोजन अधिक रुचि यह, सहस भुजा पसारि ॥ नंद कौ कर गहे ठाढ़े, यहै गिरि कौ रूप । सखी ललिता राधिका सौं, कहति देखि स्वरूप ॥ यहै कुँडल, यहै माला, यहै पीत पिछौरि । सिखर सोभा स्याम की छबि, स्याम-छबि गिरि जोरि ॥ नारि बदरोला रही, वृषभानु-घर रखवारि । तहाँ तैं उहिं भोग अरप्यौ, लियौ भुजा पसारि ॥ राधिका-छवि भूली, स्याम निरखैं ताहि । सूर प्रभु-बस भई प्यारी, कोर-लोचन चाहि ॥4॥

Pada 4

ब्रज बासिनि मोकौं बिसरायौ । भली करी बलि जो कछु, सो सब लै परबतहिं चढ़ायौ ॥ मोसौं पर्ब कियौ लघु प्रानी, ना जानियै कहा मन आयौ । तैंतिस कोटि सुरनि कौ नायक, जानि-बूझि इन मोहिं भुलायौ ॥ अब गोपनि भूतल नहिं राखौं, मेरी बलि मोहिं नहिं पहुँचायौ । सुनहु सूर मेरै मारतत धौं, परबत कैसें होत सहायौ ॥5॥

Pada 5

गिरि पर बरषन लागे बादर ॥ मेघवर्त्त, जलवर्त, सैन सजि, आए लै लै आदर ॥ सलिलि अखंड धार धर टूटत, किये इंद्र मन सादर । मेघ परस्पर यहै कहत हैं, धोई करहु गिरि खादर ॥ देखि देखि डरपत ब्रजवासी , अतिहिं भए मन कादर । यहै कहत ब्रज कौन उबारै, सुरपति कियैं निरादर ॥ सूर स्याम देखैं गिरि अपनैं. मेघनि कीन्हौ दादर । देव आपनी नहीं सम्हारत, करत इन्द्र सौ ठादर ॥6॥

Pada 6

ब्रज के लोग फिरत बितताने । गैतनि लै बन ग्वाल गए, ते धाए आवत ब्रजहिं पराने ॥ कोउ चितवत नभ-तन, चक्रित ह्वै, कोउ गिरि परत,धरनि अकुलाने । कोउ लै रहत ओट वृच्छनि की, अंध-अंध दिसि -बिदिसि भुलाने ॥ कोउ पहुँचे जैसें तैसें गृह, ढूंढ़त गृह नहिं पहिचाने । सूरदास गोबर्धन-पूजा, कीन्हे कौ फल लेहु बिहाने ॥7॥

Pada 7

राखि लेहु अब नंदकिसोर । तुम जो इंद्र की मेटी पूजा, बरसत है अति जोर ॥ ब्रजवासी तुम तन चितवत हैं, ज्यौं करि चंद चकोर । जनि जिय डरौ, नैन जनि मूँदौ, धरिहौं नख की ओर ॥ करि अभिमान इंद्र झरि लायौ, करत घटा घन घोर । सूर स्याम कह्यौ तुम कौं, राखौं बूँद न आवै छोर ॥8॥

Pada 8

स्याम लियौ गिरिराज उठाइ । धीर धरौ हर कहत सबनि सौं, गिरि गोबर्धन करत सहाइ ॥ नंद गोप ग्वालनि के आगैं, देव कह्यौ यह प्रगट सुनाइ । काहे कौं व्याकुल भएँ डोलत, रच्छा करै देवता आइ ॥ सत्य बचन गिरि-देव कहत हैं, कान्ह लेहि मोहिं कर उचकाइ । सूरदास नारी-नर ब्रज के, कहत धण्य तुम कुँवर कन्हाइ ॥9॥

Pada 9

गिरि जनि गिरै स्याम के कर तैं । करत बिचार ब्रजबासी, भय उपजत अति उर तैं ॥ लै-लै लकुट सब धाए करत सहाय जु तुरतैं । यह अति प्रबल, स्याम अति कोमल, रबकि रबकि हरबर तैं ॥ सप्त दिवस कर पर गिरि धार्‌यौ, बरसि थक्यौं अंबर तैं । गोपी ग्वाल नंद-सुत राख्यौ, मेघ-धार जलधर तैं ॥ जमलार्जुन दोउ सुत कुबेर के, तेउ उखारे जर तैं । सूरदास प्रभु इंद्र-गर्ब हरि, ब्रज राख्यौ करबर तैं ॥10॥

Pada 10

मेघनि जाइ कही पुकारि । दीन ह्वैं सुरराज आगैं, अस्त्र दीन्हे डारि ॥ सात दिन भरि बरसि ब्रज पर, गई नैकुँ न झारि । अखँड धारा सलित निझर्‌यौ, मिटी नाहिं लगारि ॥ धरनि नैकुँ न बूँद पहुँची, हरषे ब्रज-नर-नारि । सूर धन सब इंद्र आगैं, करत यहै गुहारि ॥11॥

Pada 11

घरनि घरनि ब्रज होति बधाई । सात बरष को कुँवर कन्हैया, गिरिवर धरि जीत्यौ सुरराई ॥ गर्व सहित आयौ ब्रज बोरन, वह कहि मोरी भक्ति घटाई । सात दिवस जल बरषि सिरान्यौ, तब आयौ पाइनि तर धाई ॥ कहाँ कहाँ नहिं संकट मेटत, नर-नारी सब करत बड़ाई । सूरस्याम अब कैं ब्रज राख्यौ, ग्वाल करत सब नंद दोहाई ॥12॥

Pada 12

(तेरे) भुजनि बहुत बल होइ कन्हैया । बार-बार भुज देखि तनक सै, कहति जसोदा मैया ॥ स्याम कहत नहिं भुजा पिरानी, ग्वालनि कियौ सहैया । लकुटिनि टेकि सबनि मिलि राख्यौ, अरु बाबा नँदरैया ॥ मोसौं क्यौं रहतौ गोबरधन, अतिहिं बड़ौ वह भारी । सूरस्याम यह कहि परबोध्यौ चकित देखि महतारी ॥13॥

Pada 13

मातु पिता इनके नहिं कोइ । आपहिं करता, त्रिगुन रहित हैं सोइ ॥ कितिक बार अवतार लियौ ब्रज, ये हैं ऐसे ओइ । जल-थल कीट-ब्रह्म के व्यापक, और न इन सरि होइ ॥ बसुधा-भार-उतारन-काजैं, आपु रहत तनु गोइ । सूर स्याम माता-हित-कारन, भोजन माँगत रोइ ॥14॥

Pada 14

सुरगन सहित इंद्र ब्रज आवत । धवल बरन ऐरावल देख्यौ उतरि गगन तैं धरनि धँसावत ॥ अमरा-सिव-रबि-ससि चतुरानन, हय-गय बसह हंस-मृग जावत । धर्मराज, बनराज, अनल, दिव, सारद, नारद, सिव-सुत भावत ॥ मेढ़ा, महिष, मगर, गुदरारौ, मोर, आखु, मनवाह गनावत गावत । ब्रज के लौग देखि डरपे मन, हरि आगैं कहि कहि जु सुनावत ॥ सात दिवस जल बरषि सिरान्यौ, आवत चल्यौ ब्रजहिं अतुरावत । घेरौ करत जहाँ तहँ ठाढ़े, ब्रजबासिन कौं नाहिं बचावत ॥ दूरहिं तैं बाहन सौ, उतर्‌यौ, देवनि सहित चल्यौ सिर नावत । आइ पर्‌यौ चरननि तर आतुर, सूरदास-प्रभु सीस उठावत ॥15॥

Pada 15

चीर-हरनरास लीला