व्याज मिलन

राधा-कृष्ण · 13 padas

सुनि री मैया काल्हिहीं, मोतिसरी गँवाई । सखिनि मिलै जमुना गई, धौं उनही चुराई ॥ कीधौं जलही मैं गई, यह सुधि नहिं मेरैं ! तब तैं मैं पछिताति हौं, कहति न डर तेरैं ॥ पलक नहीं निसि कहुँ लगी, मोहिं सपथ तिहारी । इहि डर तैं मैं आजुहीं,अति उठी सबारी ॥ महरि सुनत चकित भई, मुख ज्वाब न आवै । सूर राधिका गुन भरी, कोउ पार न पावै ॥1॥

Pada 1

सुनि राधा अब तोहिं न पत्यैहौं । और हार चौकी हमेल अब, तेरैं कंठ न नैहौं ॥ लाख टका की हानि करी तैं, सो जब तोसौं लैहौं । हार बिना ल्याऐं लड़बौरी, घर नहिं पैठन दैहौं ॥ जब देखौंगी वहै मोतिसरि, तबहिण तौ सचु पैहौं । नातरू सूर जन्म भरि तेरो, नाउँ नहीं मुख लैहौं ॥2॥

Pada 2

जैहै कहाँ मोतिसरि मोरि । अब सुधि भई लई वाही नैं, हँसति चली बृषभानु-किसोरी ॥ अबहीं मैं लीन्हे आवति हौं , मेरै संग आवै जनि को री । देखौ धौं कह करिहौं वाकौ, बड़े लोग सीखत हैं चोरी । मौकौं आजु अबेर लागि है, ढूढ़ौंगो घर-घर ब्रज खोरी । सूर चली निधरक ह्वै सब सौं, चतुर राधिका बातनि भोरी ॥3॥

Pada 3

नंद-महर-घर के पिछवारैं, राधा आइ बतानी ॥ मनौ अंब-दल-मौर देखि के, कुहुकी कोकिल बानी ॥ झूठेहिं नाम लेति ललिता कौ, काहै जाहु परानी । वृन्दाबन-मग जाति अकेली, सिर लै दही-मथानी ॥ मैं बैठी परखति ह्वाँ रैहौं, स्याम तबहिं तिहिं जानी । कोक-कला-गुन आगरि नागरि, सूर चतुरई ठानी ॥4॥

Pada 4

सैन दै नागरी गई बन कौं । तबहिं कर-कौर दियौ डारि, रहि सकै, ग्वाल जेंवत तजे, मोह्यौ उनकौं ॥ चले अकुलाइ बन धाइ, ब्याई गाइ देखिहौं जाइ, मन हरष कीन्हौ । प्रिया निरखति पंथ, मिलैं कब हरि कंत, गए इहिं अंत हँसि अंक लीन्हौ । अतिहिं सुख पाइ, अतुराइ मिले धाइ दोउ, मनौ अति रंक नवनिधिहिं पाई । सूर प्रभु की प्रिया राधिका अति नवल, नवल नँदलाल के मनहिं भाई ॥5॥

Pada 5

दीजै कान्ह काँधे कौ कंबर । नान्ही नान्ही बूँदनि बरषन लाग्यौ, भीजत कुसँभी अंबर ॥ बार-बार अकुलाई राधिका, देखि, मेघ-आडंबर । हँसि हँसि रीझि बैटि रहे दोऊ, ओढ़ि सुभउ पीतंबर ॥ सिव सनकादिक नारद-सारद, अंत न पावै तुंबर । सूरस्याम-गति लखि न परति कछु, खात ग्वाल सँग संबर ॥6॥

Pada 6

कान्ह कह्यौ बन रैनि न कीजै, सुनहु राधिका प्यारी । अति हित सौं उर लाइ कह्यौ, अब भवन आपनैं जा री ॥ मातु-पिता जिय जानै न कोऊ, गुप्त-प्रीति रस भारी । कर तैं कौर डारि मैं आयौ, देखत दोउ महतारी ॥ तुम जैसी मोहिं प्यारी लागति, चंद चकोर कहा री । सूरदास स्वामी इन बातनि, नागरि रिझई भारी ॥7॥

Pada 7

मै बलि जाऊँ कन्हैया की । करतैं कौर डारि उठि धायौ, बात सुनी बन गैया की ॥ धौरी गाइ आपनी जानी, उपजी प्रीति लवैया की । तातैं जल समोइ पग धोवति, स्याम देखि हित मैया की ॥ जो अनुराग जसोद कै उर, मुख की कहनि कन्हैया की । यह सुख सूर और कहूँ नाहीं, सौंह करत बल भैया की ॥8॥

Pada 8

राधा अतिहिं चतुर प्रवीन । कृष्न कौ सुख दै चल हँसि, हंस-गति कटि छीन ॥ हार कैं मिस इहाँ आई, स्याम मनि -कैं काज । भयौ सब पूरन मनोरथ, मिले श्रीब्रजराज ॥ गाँठि-आँचर छोरि कै, मोतिसरी लीन्ही हाथ । सखी आवति देख राधा, लई ताकौं साथ ॥ जुबति बूझति कहाँ नागरि, निसि गई इक जाम । सूर ब्यौरो कहि सुनायौ, मैं गई तिहिं काम ॥9॥

Pada 9

करति अवसेर बृषभानु-नारी । प्रात तै गई, बासर गयौ बीति सब , जाम निसि गई, धौं कहा बारो ॥ हार कैं त्रास मैं, कुँवरि त्रासी बहुत, तिहिं डरनि अजहुँ नाहि सदन आई । कहाँ मैं जाऊँ, कह धौं रही रूसि कैं, सखिनि सौं कहति कहुँ मिली माई ॥ हार बहि जाइ , अति गई अकुलाइ कैं, सुता कै नाउँ इक वहै मेरैं । सूर यह बात जौ सुनैं अबहीं महर, कहैं मोहिं यै ढंग तेरे ॥10॥

Pada 10

राधा डर डराति घर आई । देखत हीं कीरति महतारी, हरषि, कुँवरि उर लाई ॥ धीरज भयौ सुता-माता जिय, दूरि गयौ तनु-सोच । मेरी कौं मैं काहैं त्रासी, कहा कियौ यह पोच ॥ लै री मैया हार मोतिसरी, जा कारन मोहिं त्रासी । सूर राधिका के गुन ऐसे, मिलि आई अबिनासी ॥11॥

Pada 11

परम चतुर वृषभानु-दुलारी । यह मति रची कृष्न मिलिबे की, परम पुनीत महा री ॥ उत सुख दियौ नंद-नंदन कौं, इतहिं हरष महतारी । हार इतौ उपकार करायौ, कबहुँ न उर तैं टारी ॥ जे सिव-सनक-सनातन दुर्लभ, ते बस किये कुमारी । सूरदास-प्रभु-कृपा अगोचर, निगमनि हू तैं न्यारी ॥12॥

Pada 12

प्रीति के बस्य के हैं मुरारी । प्रीति के बस्य नटवर सुभेषहिं धर्‌यौ, प्रीति बस करज गिरिराज धारी । प्रीति के बस्य ब्रज भए-माखन चोर, प्रीति बस्य दाँवरि बँधाई । प्रीति के बस्य गोपी-रमन नाम प्रिय, प्रीति बस जमल तरु मोच्छदाई । प्रीतिबस नंद-बंधन बरुन गृह गए, प्रीति के बस्य-बन-धाम कामी । प्रीति के बस्य प्रभु सूर त्रिभुवन बिदित, प्रीति बस सदा राधिका स्वामी ॥13॥

Pada 13

सहसा भेंटभ्रम