भ्रम

राधा-कृष्ण · 2 padas

आजु सखी अरुनोदय मेरे, नैननि कौं धोख भयौ । की हरि आजु पंथ इहिं गवने, स्याम जलद की उनयौ ॥ की बग पाँति भाँति, उर पर की मुकुट-माल बहु मोल । कीधौं मोर मुदित नाचत, की बरह-मुकुट की डोल ॥ की घनघोर गंभीर प्रात उटी, की ग्वालनि की टेरनि । की दामिनी कौंधति चहुँ दिसि, की सुभग पीत पट फेरनि ॥ की बनमाल लाल-उर राजति, की सुरपति-धनु चारू । सूरदास-प्रभु-रस भरि उमँगी, राधा कहति बिचारु ॥1॥

Pada 1

राधिका हृदय तैं धोख टारौ । नंद के ला देखे प्रात-काल तैं, मेघ नहिं स्याम तनु-छबि बिचारौ । इंद्र-धनु नहीं बन दाम बहु सुमन के, नहीं बग पाँति बर मोति-माला । सिखी वह नहीं सिर मुकुट सीखंड पछ, तड़ित नहिं पीत पट-छवि रसाला ॥ मंद गरजन नहीं चरन नूपुर-सबद, भोरही आजु हरि गवन कीन्हौ ॥ सूर प्रभु भामिनी भवन करि गवन, मन रवन दुख के दवन जानि लीन्हौ ॥2॥

Pada 2

व्याज मिलनएकनिष्ठा