आजु सखी अरुनोदय मेरे, नैननि कौं धोख भयौ । की हरि आजु पंथ इहिं गवने, स्याम जलद की उनयौ ॥ की बग पाँति भाँति, उर पर की मुकुट-माल बहु मोल । कीधौं मोर मुदित नाचत, की बरह-मुकुट की डोल ॥ की घनघोर गंभीर प्रात उटी, की ग्वालनि की टेरनि । की दामिनी कौंधति चहुँ दिसि, की सुभग पीत पट फेरनि ॥ की बनमाल लाल-उर राजति, की सुरपति-धनु चारू । सूरदास-प्रभु-रस भरि उमँगी, राधा कहति बिचारु ॥1॥
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