लघुमान लीला

राधा-कृष्ण · 14 padas

मैं अपनैं जिय गर्व कियौ । वै अंतरजामी सब जानत देखत ही उन चरचि लियौ ॥ कासौं कहौ मिलावै को अब,नैकु न धीरज धरत जियौ । वैतौ निठुर भए या बुधि सौं, अहंकार फल यहै दियौ ॥ तब आपुन कौं निठुर करावति, प्रीति सुमिरि भरि लेति हियौ । सूर स्याम प्रभु वै बहु नायक , मोसी उनकैं कोटि सियौ ॥1॥

Pada 1

महा बिरह-बन माँझ परी । चकित भई ज्यौ चित्र-पूतरी, हरि मारग बिसरी ॥ सँग बटपार-गर्ब जब देख्यौ, साथी छोड़ि पराने । स्याम -सहर-अँग -अंग-माधुरो, तहँ वै जाइ लुकाने । यह बन माँझ अकेली ब्याकुल, संपति गर्ब छँड़ायौं । सूर स्याम-सुधि टरति न उर तैं यह मनु जीव बचायौ ॥2॥

Pada 2

राधा-भवन सखी मिलि आईं । अति व्याकुल सुधि-बुधि कछु नाहीं , देह दसा बिसराई ॥ बाँह गही तिहि बूझन लागीं, कहा भयौ री माई । ऐसी बिबस भई तू काहैं, कहौ न हमहिं सुनाई ॥ कालिहिं और बरन तोहिं देखी, आजु गई मुरझाई । सूर स्याम देखे की बहुरौ, उनहिं ठगौरी लाई ॥3॥

Pada 3

अब मैं तोसौ कहा दुराऊँ । अपनी कथा, स्याम की करनी, तो आगै कहि प्रगट सुनाऊँ ॥ मैं बैठी ही भवन आपनैं, आपुन द्वार दियौ दरसाऊँ । जानि लई मेरे जिय की उन, गर्ब-प्रहारन उनकौं नाऊँ ॥ तबहीं तैं ब्याकुल भई डोलति, चित न रहै कितनौ समुझाऊँ । सुनहु सूर गृह बन बयौ मोकौं, अब कैसैं हरि-दरसन पाऊँ ॥4॥

Pada 4

हमरी सुरति बिसारी बनवारी, हम सरबस दै हारी । पै न भइ अपने सनेह बस, सपनेहू गिरधारी ॥ वै मोहन मधुकर समान सखि, अनगन बेली-चारी । ब्याकुल बिरह व्यापी दिन-दिन हम, नीर जु नैननि ढारी ॥ हम तन मन दै हाथ बिकानी, वै अति निठुर मुरारी । सूर स्याम बहु रमनि रमन , हम इक ब्रत, मदन-प्रजारी ॥5॥

Pada 5

मैं अपनी सी बहुत करी री । मोसौं कहा कहति तू माई, मन कैं सँग मैं बहुत लरी री ॥ राखौं हटकि ,उतहिं कौ धावत, बाकी ऐसियै परनि परी री । मोसौं बैर करै रति उनसौ, मोकौ राख्यौ द्वार खरी री ॥ अजहूँ मान करौं, मन पाऊँ, यह कहि इत-उत चितै डरी री । सुनहु सूर पाँचगनि मत एकै, मैं ही मोही रही परी री ॥6॥

Pada 6

भूलि नहीं, अब मान करौं री । जातैं होइ अकाज आपनौ, काहैं बृथा मरौं री ॥ ऐसे तन मैं गर्ब न राखौं । चिंतामनि बिसरौं री । ऐसी बात कहै जो कोऊ, ताकैं संग लरौं री । आरजपंथ चलैं कह सरिहै, स्यामहिं संग फिरौं री । सूर स्याम जउ आपु स्वारथी, दरसन नैन भरौं री ॥7॥

Pada 7

माई मेरौ मन पिय सों यौं लाग्यौ, ज्यौं सँग लागी छाँहि । मेरौ मन पिय जीव बसत है, पिय जिय मो मैं नाहि ॥ ज्यौं चकोर चंदा कौं निरखत, इत-उत दृष्टि न जाइ । सूर स्याम बिनु छिन-छिन जुग सम, क्यौं करि रैन बिहाइ ॥8॥

Pada 8

अद्भुत एक अनूपम बाग । जुगल कमल पर गज बर क्रीड़त, तापर सिंह करत अनुराग । हरि पर सरबर, सर पर गिरिवर , गिर पर फूले कंज-पराग । रुचिर कपोत बसत ता ऊपर, ता ऊपर अमृत फल लाग । फल पर पुहुप, पुहुप पर पल्लव, ता पर सुक, पिक, मृग मद काग । खंजन, धनुष, चंद्रमा ऊपर, ता ऊपर एक मनिधर नाग । अंग-अंग प्रति और-और छबि, उपमा ताकौं करत न त्याग । सूरदास प्रभु पियौ सुधा-रस, मानौ अधरनि के बड़ भाग ॥9॥

Pada 9

भुज भरि लई हिरदय लाइ । बिरह ब्याकुल देखि बाला, नैन दोउ भरि आइ ॥ रैनि बासर बीचही मैं, दोउ गए मुरझाइ । मनौ बृच्छ तमाल बेली, कनक सुधा सिंचाइ ॥ हरष डहडह मुसुकि फूले, प्रेम फलनि लगाइ । काम मुरझनि बेली तरु की, तुरत ही बिसराइ॥ देखि ललिता मिलन वह, आनंद उर न समाइ । सूर के प्रभु स्याम स्यामा, त्रिबिध ताप नसाइ ॥10॥

Pada 10

ललिता प्रेम-बिबस भई भारी । वह चितबनि, वह मिलनि परस्पर , अति सोभा वर नारी ॥ इकटक अंग-अंग अवलोकति, उत बस भए बिहारी । वह आतुर छबि लेत देत वै, इक तैं इक अधिकारी ॥ ललिता संग सखिनि सौं भाषति , देखौ छबि पिय-प्यारी । सुनहु सूर ज्यौं होम अगिनि घृत, ताहूँ तैं यह न्यारी ॥11॥

Pada 11

राधेहिं मिलेहुँ प्रतीति न आवति । जदपि नाथ बिधु बदन बिलोकत, दरसन कौ सुख पावति ॥ भरि भरि लोचन रूप-परम-निधि, उरमैं आनि दुरावति । बिरह-विकल मति दृष्टि दुहूँ दिसि, संचि सरघा ज्यौं धावति ॥ चितवत चकित रहति चित अंतर, नैन निमेष न लावति । सपनौ आहि कि सत्य ईस यह, बुद्धि बितर्क बनावति ॥ कबहुँक करति बिचार कौन हौं, को हरि कैं हिय भावति । सूर प्रेम की बात अटपटी, मन तरंग उपजावति ॥12॥

Pada 12

स्याम भए राधा बस ऐसैं । चातक स्वाति, चकोर चंद ज्यौं, चक्रवाक रबि जैसें ॥ नाद कुरंग, मीन जल की गति, ज्यौं तनु कैं बस छाया । इकटक नैन अंग-छबि मोहे, थकित भए पति जाया ॥ उठैं उठत, बैठैं बैठत हैं, चलैं चलत सुधि नाहीं । सूरदास बड़भागिनि राधा, समुझि मनहिं मुसुकाहीं ॥13॥

Pada 13

निरखि पिय-रूप तिय चकित भारी । किधौं वै पुरुष मैं नारि, की वै नारि मैं ही हौं तन सुधि बिसारी ॥ आपु तन चितै सिर मुकुट, कुंडल स्रवन, अधर मुरली, माल बन बिराजै ॥ उतहिं पिय-रूप सिर माँग बेनी सुभग, भाल बेंदी-बिंदु महा छाजै ॥ नागरी हठ तजौ, कृपा करि मोहिं भजौ , परी कह चूक सो कहौ प्यारी । सूर नागरी प्रभु-बिरह-रस मगन भई, देखि छबि हँसत गिरिराजधारी ॥14॥

Pada 14

एकनिष्ठाकृष्ण गोपिका