कृष्ण गोपिका

राधा-कृष्ण · 9 padas

नंद-नंदन तिय-छबि तनु काछे । मनु गोरी साँवरी नारि दोउ, जाति सहज मै आछे ॥ स्याम अंग कुसुमी नई सारी, फल-गुँजा की भाँति । इत नागरि नीलांबर पहिरे, जनु दामिनि घन काँति ॥ आतुर चले जात बन धामहिं, मन अति हरष बढ़ाए । सूर स्याम वा छबि कौं नागरि, निरखति नैन चुराए ॥1॥

Pada 1

स्यामा स्याम कुंज बन आवत । भुज भुज-कंठ परस्पर दीन्है, यह छबि उनहीं पावत ॥ इततैं चंद्रावली-जाति ब्रज, उततैं ये दौउ आए । दूरहि तैं चितवति उनहीं तन, इक टक नैन लगाए ॥ एक राधिका दूसरि को है, याकौं नहि पहिचानैं । ब्रज-बृषभानु-पुरा-जुवतिनि कौं, इक-इक करि मैं जानौ ॥ यह आई कहूँ और गाँव तैं, छबि साँवरौ सलोनी । सूर आजु यह नई बतानी, एकौ अँग न बिलोनी ॥2॥

Pada 2

यह भृषभानु-सुता वह को है । याकी सरि जुवती कोउ नाहीं, यह त्रिभुवन-मन मोहै ॥ अति आतुर देखन कौं आवति, निकट जाइ पहिचानौं । ब्रज मैं रहति किधौं कहुँ ओरै, बूझे तैं तब जानौं ॥ यह मोहिनी कहाँ तैं आई, परम सलोनी नारी । सूर स्याम देखत मुसुक्यानी, करी चतुरई भारी॥3॥

Pada 3

कहि राधा ये को हैं री । अति सुंदरी साँवरी सलोनी, त्रिभुवन-जन-जन मोहैं री । और नारि इनकी सरि नाहीं, कहौ न हम-तन जोहैं । काकी सुता, बधू हैं काकी, जुवती धौं हैं री ॥ जैसी तुम तैसी हैं येऊ, भली बनी तुमसौं है री । सुनहु सूर अति चतुर राधिका, येइ चतुरनि की गौ हैंरी ॥4॥

Pada 4

मथुरा तैं ये आई हैं । कछु संबंध हमारी इनसौं, तातैं इनहिं बुलाई हैं ॥ ललिता संग गई दधि बेंचन, उनहीं इनहीं चिन्हाई हैं । उहै सनेह जानि री सजनी, आजु मिलन हम आई हैं ॥ तब ही की पहिचानि हमारी,ऐसी सहज सुभाई हैं । सूरदास मोहिं आवत देखी, आपु संग उठि धाई हैं ॥5॥

Pada 5

इनकौं ब्रजहीं क्यौं न बुलावहु । की वृषभान पुरा, की गोकुल, निकटहिं आनि बसावहु ॥ येऊ नवल नवल तुमहूँ हौ, मोहन कौं दोउ भावहु । मोकौं देखि कियौ अति घूँघट, बाहैं न लाज छुड़ावहु । यह अचरज देख्यौ नहिं कबहुँ, जुवतिहिं जुवति दुरावहु । सूर सखी राधा सौं पुनि पुनि, कहति जु हमहिं मिलावहु ॥6॥

Pada 6

मथुरा मैं बस बास तुम्हारौ ? राधा तैं उपकार भयौ वह, दुर्लभ दरसन भयो तुम्हारी ॥ बार-बार कर गहि निरखति, घूँघट-ओट करौ किन न्यारौ । कबहुँक कर परसति कपौल छुइ, चुटकि लेति ह्याँ हमहिं निहारी ॥ कछु मैं हूँ पहिचानति तुमकौं, तुमहि मिलाऊँ नंद-दुलारौ । काहें कौं तुम सकुचति हौ जू, कहौ काह है नाम तुम्हारौ ॥ ऐसौ सखी मिली तोहि राधा, तौ हमकौं काहै न बिसारौ । सूरदास दंपति मन जान्यौ, यातैं कैसैं होत उबारौ ॥7॥

Pada 7

ऐसी कुँवरि कहाँ तुम पाई । राधा हूँ तैं नख-सिख सुंदरि, अब लौं कहाँ दुराई ॥ काकी नारि कौन की बेटी, कौन गाउँ तैं आई । देखी सुनि न ब्रज, वृंदावन, सुधि-बुधि हरति पराई ॥ धन्य सुहाग भाग याकौ, यह जुवतिनि की मनभाई । सूरदास-प्रभु हरिषि मिले हँसि, लै उर कंठ लगाई ॥8॥

Pada 8

नंद-नंदन हँसे नागरी-मुख चितै, हरिषि चंद्रावली कंठ लाई । बाम भुज रवनि, दच्छिन भुजा सखी पर, चले बन धाम सुख कहि न जाई । मनौ बिबि दामिनी बीच नव घन सुभग, देखि छबि काम रति सहित लाजै ॥ किधौं कंचन लता बीच सु तमाल तरु, भामिनिनि बीच गिरधर बिराजै । गए गृहकुंज, अलिगुंज, सुमननि पुंज, देखि आनंद भरे सूर स्वामी । राधिका-रवन, जुवती-रवन, मन-रवन निरखि छवि होत मनकाम कामी ॥9॥

Pada 9

लघुमान लीलामान लीला