गारुड़ी कृष्ण

राधा-कृष्ण · 8 padas

सखियनि मिलि राधा घर लाईं । देखहु महरि सुता अपनी कौं, कहूँ इहिं कारैं खाई ॥ हम आगैं आवति, यह पाछैं धरनि परी भहराई । सिर तैं गई दोहनी ढरिकै, आपु रही मुरझाई ॥ स्याम-भुअंग डस्यौ हम देखत, ल्यावहु गुनी बुलाई । रोवति जननि कंठ लपटानी, सूर स्याम गुन राई ॥1॥

Pada 1

नंद-सुवन गारुड़ी बुलावहु । कह्यौ हमारौ सुवत न कोऊ, तुरत जाहु, लै आवहु ॥ ऐसी गुनी नहिं त्रिभुवन कहूँ, हम जानतिं हैं नीकैं । आइ जाइ तौ तुरत जियावहि, नैंकु छुवत उठै जी कै ॥ देखौ धौं यह बात हमारी, एकहि मंत्र जिवावै । नंद महर कौ सुत सूरज जौ, कैसेहुँ ह्याँ लौं आवै ॥2॥

Pada 2

महरि, गारुड़ी कुँवर कन्हाई । एक बिटिनियाँ कारैं खाई, ताकौं स्याम तुरतहीं ज्याई ॥ बोलि लेहु अपने ढौटा कौं, तुम कहि कै देउ नैंकु पठाई । कुँवरि राधिका प्राप्त खरिक गई , तहाँ कहूँ-धौं कारैं खाई ॥ यह सुनि महरि मनहिं मुसुक्यानी, अबहिं रही मेरैं गृह आई । सूर स्याम राधहिं कछु कारन, जसुमति समुझि रही अरगाई ॥3॥

Pada 3

तब हरि कौं टेरति नँदरानी । भली भई सुत भयौ गारुड़ी, आजु सुनी यह बानी ॥ जननी-टेर सुनत हरि आए, कहा कहति री मैया ? कीरति महरि बुलावन आई, जाहु न कुँवर कन्हैया ॥ कहूँ राधिका कारैं खायौ, जाहु न आवौ झारि । जंत्र-मंत्र कछु जानत हौ तुम, सूर स्याम बनवारि ॥4॥

Pada 4

हरि गारुड़ी तहाँ तब आए । यह बानि वृषभानुसुता सुनि मन-मन हरष बढ़ाए ॥ धन्य-धन्य आपुन कौं कीन्हौं अतिहिं गई मुरझाइ । तनु पुलकित रोमांच प्रगट भए आनँद-अस्रु बहाइ ॥ विह्वल देखि जननि भई व्याकुल अंग विष गयौ समाइ । सूर स्याम-प्यारी दोउ जानत अंतरगत कौ भाइ ॥5॥

Pada 5

रोवति महरि फिरति बिततानी । बार-बार लै कंठ लगावति, अतिहिं सिथिल भई पानी । नंद सुवन कैं पाइ परी लै, दौरि महरि तब आइ । व्याकुल भई लाड़िली मेरी, मोहन देहु जिवाइ ॥ कछु पढ़ि पढ़ि कर, अंग परस करि, बिष अपनौ लियौ झारि । सूरदास-प्रभु बड़े गारुड़ी, सिर पर गाड़ू डारि ॥6॥

Pada 6

लोचन दए कुँवरि उधारि । कुँवर देख्यौ नंद कौ तब सकुची अंग सम्हारि ॥ बात बूझति जननि सौं री कहा है यह आज । मरत तैं तू बचो प्यारी करति है कह लाज ॥ तब कहति तोहिं कारैं खाई कछु न रहि सुधि गात । सूर प्रभु तोहिं ज्याइ लीन्हीं कहौ कुँवरि सौं मात ॥7॥

Pada 7

बड़ौं मंत्र कियौ कुँवर कन्हाई । बार-बार लै कंठ लगायौ; मुख चूम्यौ दियौ घरहिं पठाई ॥ धन्य कोषि वह महरि जसोमति, जहाँ अवतर्‌यौ यह सुत आई । ऐसौ चरित तुरतहीं कीन्हौं, कुँवरि हमारी मरी जिवाई ॥ मनहीं मन अनुमान कियौं यह, बिधिना जोरी भली बणाई । सूरदास प्रभु बड़े गारुड़ी, ब्रज घर-घर यह घैरु चलाई ॥8॥

Pada 8

प्रथम मिलनसंबंध रहस्य