उद्धव हृदय परिवर्तन तथा गोपी सन्देश

उद्धव संदेश · 14 padas

मैं ब्रजबासिन की बलिहारी । जिनके संग सदा क्रीड़त हैं, श्री गोबरधन-धारी ॥ किनहूँ कैं घर माखन चोरत, किनहूँ कैं संग दानी । किनहूँ कैं सँग धेनु चरावत, हरि की अकथ कहानी ॥ किनहूँ कैं सँग जमुना कै तट, बशी टेरि सुनावत । सूरदास बलि-बलि चरननि की, यह सुख मोहिं नित भावत ॥1॥

Pada 1

हौं इन मोरनि की बलिहारी । जिनकी सुभग चंद्रिका माथैं, धरत गोबरधनधारी ॥ बलिहारी वा बाँस-बंस की, बंसी सी सुकुमारी । सदा रहति है कर जु स्याम कैं, नैकहुँ होति न न्यारी ॥ बलिहारी वा गुंज-जाति की, उपजी जगत उज्यारी । सुन्दर हृदय रहत मोहन कैं, कबहूँ टरत न टारी ॥ बलिहारी कुल सैल सरति जिहिं, कहत कलिंद-दुलारी । निसि-दिन कान्ह अंग आलिंगन आपुनहुँ भई कारी ॥ बलिहारी वृंदावन भूमिहिं, सुतौ भाग की सारी । सूरदास प्रभुन नाँगे पाइनि, दिन प्रति गैया चारी ॥2॥

Pada 2

हम पर हेत किये रहिबौ । या ब्रज कौ ब्यौहार सखा तुम, हरि सौं सब कहिबौ ॥ देखे जात आपनी अँखियन, या तन को दहिबौ । तन की बिथा कहा कहौं तुमसौं, यह हमकौं सहिबौ ॥ तब न कियौ प्रहार प्राननि कौ, फिरि फिरि क्यौं चहिबौ । अब न देह जरि जाइ सूर इनि नैननि कौ बहिबौ ॥3॥

Pada 3

स्वामी पहिलौ प्रेम सँभारौ । ऊधौ जाइ चरन गहि कहियै, जी तैं हित न उतारौ ॥ जो तुम मधुबन राज काज भए, गोकुल हम न अधारौ ॥ कमल नयन सो चैन न देखौ, नित उठि गोधन चारौ ॥ ये ब्रज लोग मया के सेवक, तिनसौं क्यौं न बिहारौ । सूरदास प्रभु एक बार मिलि, सकल बिरह दुख टारौ ॥4॥

Pada 4

इतनी बात अलि कहियौ हरि सौं, कब लगि यह मन दुख मैं गारैं । पथ जोहत तन कोकिल बरन भइँ, निसि न नींद पिय पियहिं पुकारैं ॥ जा दिन तैं बिछुरे नँद-नंदन, अति दुख दारुन क्यौं निरबारैं । सूरदास प्रभु बिनु यह बिपदा, काकौ दरसन देखि बिसारैं ॥5॥

Pada 5

ऊधौ जू, कहियौ तुम हरि सौं जाइ, हमारे हिय की दरद । दिन नहिं चैन, रैन नहिं सोवति, पावक भई जुन्हाई सरद ॥ जबतैं लै अक्रुर गए हैं, भई बिरह तन बाइ छरद । काम प्रबल जाके अति ऊधौ, सोचत भइ जस पीत हरद ॥ सखा प्रवीन निरंतर हरि के, तातैं कहति हैं खोलि परद । ध्यावतिं रूप दरस तजि हरि कौ, सूर मूरि बिनु होतिं मुरद ॥6॥

Pada 6

ऊधौ इक पतिया हमरी लीजै । चरन लागि गोविंद सौं कहियौ, लिखौ हमारौ दीजै ॥ हम तौ कौन रूप गुन आगरि, जिहिं गुपाल जू रीझैं । निरखत नैन-नीर भरि आए, अरु कंचुकि पट भीजैं ॥ तलफत रहति मीन चातक ज्यौं,जल बिनु तृषा न छीजै । अति ब्याकुल अकुलातिं बिरहिनी, सुरति हमारी कीजै ॥ अँखियाँ खरी निहारतिं मधुबन, हरि-बिनु बिष पीजै । सूरदास-प्रभु कबहिं मिलैंगे, देखि देखि मुख जीजै ॥7॥

Pada 7

हम मति हीन कहा कछु जानैं, ब्रजबासिनी अहीर । वै जु किसोर नवल नागर तन, बहुत भूप की भीर ॥ बचन की लाज सुरति करि राखौं, तुम अलि इतनौ कहियौ । भली भई जो दूत पठायौ, इतनौ बोल निबहियौ ॥ एक बार तौ मिलौ कृपा करि, जौ अपनौ ब्रज जानौ । यहै रीति संसार सबनि की, कहा रंक कह रानौ ॥ हम अनाथ तुम नाथ गुसाईं, क्यौं, नहिं सोई । षट रितु ब्रज पै आनि पुकारैं, सूरदास अब कोई ॥8॥

Pada 8

नंदनँदन सौं इतनी कहियौ । जद्यपि ब्रज अनाथ करि डार्‌यौ, तद्यपि सुरति किये चित रहियौ । तिनका तोर करहु जनि हम सौं, एक बास की लाज निबहियौ । गुन आँगुननि दोष नहिं कीजतु, हम दासिनि की इतनी सहियौ ॥ तुम बिनु प्रान कहा हम करिहैं, यह अवलंब न सुपनेहु लहियौ । सूरदास पाती लिखि पठई, जहाँ प्रीति तहँ ओर निबहियौ ॥9॥

Pada 9

बिनु गुपाल बैरिनि भईं कुंजै । तब वै लता लगति तन सीतल, अब भईं बिषम ज्वाल की पुंजैं ॥ वृथा बहति जमुना, खग बोलत वृथा कमल-फूलनि अलि गुंजैं । पवन, पान, घनसार, सजीवन, दधि-सुत किरनि भानु भईं भुंजैं ॥ यह ऊधौ कहियौ माधौ सौं,मदन मारि कीन्हीं हम लुंजैं । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौं, मग-जोवत अँखियाँ भईं छुंजै ॥10॥

Pada 10

ऊधौ इतनी कहियौ बात । मदन गुपाल बिना या ब्रज मैं, होन लगे उतपात ॥ तृनावर्त , बक, बकी, अघासुर , धेनुक फिरि फिरि जात । ब्योम, प्रलंब, कंस केसी इत, करत जिअनि की घात ॥ काली काल-रूप दिखियत है, जमुना जलहिं अन्हात । बरुन फाँस फाँस्यौ चाहत है, सुनियत अति मुरझात ॥ इंद्र आपने परिहँस कारन, बार-बार अनखात । गोपी,गाइ, गोप, गोसुत सब, थर थर काँपत गात । अंचल फारति जननि जसोदा, पाग लिये कर तात । लागौ बेगि गुहारि सूर प्रभु, गोकुल बैरिनि घात ॥11॥

Pada 11

ऊधौ इतनी कहियौ जाइ । अति कृस गात भईं ये तुम बिनु, परम दुखारी गाइ ॥ जल समूह बरषतिं दोउ अँखियाँ, हूँकति लौन्है नाउँ । जहाँ जहाँ गो दोहन कीन्हौ, सूँघति सोई ठाउँ । परति पछार खाइ छिन ही छिन, अति आतुर ह्वै दीन । मानहु सूर काढ़ि डारी हैं, बारि मध्य तैं मीन ॥12॥

Pada 12

अति मलीन बृषभानुकुमारी । हरि स्रम -जल भींज्यौ उर-अंचल, तिहिं लालच न धुवावति सारी ॥ अध मुख रहति अनत नहिं चितवति, ज्यौं गथ हारे थकित जुवारी । छुटे चिकुर बदन कुम्हिलाने, ज्यौ नलिनी हिमकर की मारी ॥ हरि सँदेस सुनि सहज मृतक भइ, इक बिरहिनि , दूजे अलि जारी । सूरदास कैसें करि जीवैं, ब्रज बनिता बिन स्याम दुखारी ॥13॥

Pada 13

ऊधौ तिहारे पा लागति हौं , बहुरिहुँ इहिं ब्रज करबी भाँवरी । निसि न नींद भोजन नहीं भावै; चितवत मग भइ दृष्टि झाँवरी ॥ वहै वृंदावन, बहै कुँज-धन, वहै जमुना वहै सुभग साँवरी । एक स्याम बिनु कछु न भावै, रटति फिरतिं ज्यौं बकति बावरी ॥ चलि न सकति मग डुलत धरत -पग, आवति बैठत उठत ताँवरी । सूरदास-प्रभु आनि मिलावहु,जग मैं कीरति होइ रावरी ॥14॥

Pada 14

उद्धव-गोपी संवाद भाग ५पूर्ण परिवर्तन तथा यशोदा संदेश