पूर्ण परिवर्तन तथा यशोदा संदेश

उद्धव संदेश · 6 padas

अब अति चकितवंत मन मेरौ । आयौ हो निरगुन, उपदेसन भयौ सगुन कौ चेरौ ॥ जो मैं ज्ञान कह्यौगीता कौ, तुमहिं न परस्यौ नैरो । अति अज्ञान कछु कहत न आवै, दूत भयौ हरि केरौ ॥ निज जन जानि मानि जतननि तुम, कीन्हो नेह घनेरौ । सूर मधुप उठि चले मधुपुरी, बोरि जोग कौ बेरौ ॥1॥

Pada 1

ऊधौ पा लागति हौं कहियौ, स्यामहिं इतनी बात । इतनी दूर बसत क्यौं बिसरे, अपने जननी-जात ॥ जा दिन तैं मधुपुरी सिधारे, स्याम मनोहर गात । ता दिन तैं मेरे नैन पपीहा, दरस प्यास अकुलात ॥ जहँ खेलन के ठौर तुम्हारे, नंद देखि मुरझात । जौ कबहूँ इठि जात खरिक लौं, गाइ दुहावन प्रात ॥ दुहत देखि औरनि के लरिका, प्रान निकसि नहिं जात । सूरदास बहुरौ कब देखौं, कोमल कर दधि-खात ॥2॥

Pada 2

तब तुम मेरैं काहे कौं आए । मथुरा क्यौं न रहे जदुनंदन, जौ पै कान्ह देवकी जाए ॥ दूध, दही काहे कौं चोर्‌यौ, काहे कौं बन बच्छ चराए । अध अरिष्ट, काली फनि काढ्यौ, विष जलतैं सब सखा जिवाए ॥ पय पीवत हरे प्रान पूतना, सदा किए जसुमति के भाए । सूरदास लोगनि के भुरए, काहैं कान्ह अब होत पराए ॥3॥

Pada 3

(मोहन) अपनी गैयाँ घेरि लै । बिडरी जातिं काहु नहिं मानतिं, नैंकु मुरलि की टेर दै ॥ धौरी, घूमरि, पीरी, काजरि, बन-बन फिरती पीय । अपनी जानि कै आनि सँभारहुँ, धरी चेत अब जीय ॥ तुम हौ जग जीवनि प्रतिपालक , निठुराई नहिं कीजै । ग्वालऽरु बाल बच्छ गो बिलखत, सूर सु दरसन दीजै ॥4॥

Pada 4

तब तैं छीन सरीर सुबाहु । आधौ भोजन सुबल करत है, सब ग्वालनि उर दाहु ॥ नंद गोप पिछवारे डोलत, नैननि नीर प्रवाहु । आनँद मिट्यौ मिटी सब लीला, काहू मन न उछाहु ॥ एक बेर बहुरौ बज आवहु, दूध पतूखी खाहु । सूर सपथ गोकुल जौ पैठहु, उलटि मधुपुरी जाहु ॥5॥

Pada 5

कहियौ जसुमति की अअसीस । जहाँ रहौ तहँ लाड़िलौ, जीवौ कोटि बरीस । मुरली दई दोहनी घृत भरि , ऊधौ धरि लई सीस । यह तौ घृत उनही सुरभिनि कौ, जे प्यारी जगदीस ॥ ऊधौ चलत सखा मिलि आए , ग्वाल बाल दस -दीस । अबकैं यह ब्रज फेरि बसावहु, सूरदास के ईस ॥6॥

Pada 6

उद्धव हृदय परिवर्तन तथा गोपी सन्देशउद्धव मथुरा प्रत्यागमन तथा कृष्ण उद्धव संवाद