उद्धव का गोपियों को पाती देना

उद्धव संदेश · 9 padas

ब्रज घर-घर सब होति बधाइ । कँचन कलस दूब दधि रोचन ,लै वृँदाबन आइ ॥ मिली ब्रजनारि तिलक सिर कीनौ, करि प्रदच्छिना तासु । पूछत कुसल नारि-नर हरषत, आए सब ब्रज-बासु ॥ सकसकात तनधकधकात उर, अकबकात सब ठाढ़े । सूर उपँग-सुत बोलत नाहीं, अति हिरदै ह्वै गाढ़े ॥1॥

Pada 1

ऊधौ कहौ हरि कुसलात । कह्यौ आवन किधौं नाहीं, बोलिऐ मुख बात ॥ एक छिन जुग जात हमकौं, बिनु सुने हरि प्रीति । आपु आए कृपा कीन्हीं , अब कहौ कछु नीति ॥ तब उपँग-सुत सबनि बोले, सुनौ श्रीमुख जोग । सूर सुनि सब दौरि आईं, हटकि दीन्हौ लोग ॥2॥

Pada 2

गोपी सुनहु हरि संदेस । गए संग अक्रूर मधुबन, हत्यौ कंस नरेस ॥ रजक मार्‌यौ बसन पहिरे, धनुष तोर्‌यौ जाइ । कुबलया, चानूर मुष्टिक, दिए धरनि गिराइ ॥ मातु पितु के बंद छोरे, बासुदेव कुमार । राज दीन्हौ उग्रसेनहिं, चौंर निज कर ढार ॥ कह्यौ तुमकौं ब्रह्म ध्यावन, छाँड़ि बिषय बिकार । सूर पाती दई लिखि मोंहिं, पढ़ौ गोप-कुमारि ॥3॥

Pada 3

पाती मधुबन ही तैं आई । सुंदर स्याम आपु लिखि पठई, आइ सुनौ री माई ॥ अपने गृह तैं दौरीं, लै पाती उर लाई । नैननि निरखि निमेष न खंडित, प्रेम-तृषा न बुझाई ॥ कहा करौं सूनौ गह गोकुल, हरि बिनु कछु न सुहाई । सूरदास ब्रज चूक तैं, स्याम सुरति बिसराई ॥4॥

Pada 4

निरखति अंक स्याम सुंदर के बार बार लावतिं लै छाती । लोचन जल कागद मसि मिलि कै, ह्वै गइ स्याम स्याम जू की पाती ॥ गोकुल बसत नंदनंदन के, कबहुँक बयारि न लागी ताती । अरु हम उती कहा कहैं ऊधौ, जब सुनि बेनु नाद सँग जाती ॥ उनकैं लाड़ बनति नहिं काहूँ, निसि दिन रसिक-रास-रस राती । प्रान-नाथ तुम कबहि मिलौगे, सूरदास प्रभु बाल-सँघाती ॥5॥

Pada 5

पाती मधुबन तैं आई । ऊधौ हरि के परम सनेही, ताकैं हाथ पठाई ॥ कोले पढ़ति, कोउ धरति नैन पर, काहूँ हृदै लगाई । कोउ पूछति फिरि फिर ऊधौ कौं, आपुन लिखी कन्हाई ? बहुरौ दई फेरि ऊधौ कौं, तब उन बाँचि सुनाई । मन मैं ध्यान हमारौ राख्यौ, सूर सदा सुखदाई ॥6॥

Pada 6

लिखि आई ब्रजनाथ की छाप । ऊधौ बाँधे फिरत सीस पर, बाचत आवै ताप ॥ उलटि रीति नंदनंदन की, घर-घर भयौ संताप । कहियौ जाइ जोग आराधैं, अविगत अकथ अमाप ॥ हरि आगैं कुबिजा अधिकारिनि, को जीवै इहिं दाप । सूर सँदेस सुनावत लागे, कहौ कौन यह पाप ॥7॥

Pada 7

कोउ ब्रज बाँचत नाहिंन पाती । कत लिखि-लिखि पठवत नंद-नंदन, कठिन बिरह की काँती ॥ नैन स्रजल कागद अति कोमल , कर अँगुरी अति ताती । परसैं जरैं, बिलौकैं भीजै, दुहूँ भाँति दुख छाती ॥ को बाँचै ये अंक सूरप्रभु कठिन मदन-सर-घाती । सब सुख लै गए स्याम मनौहर, हमकौं दुख दै थाती ॥8॥

Pada 8

ऊधौ कहा करैं लै पाती । जौ लौं मदनगुपाल न देखैं, बिरह जरावत छाती ॥ निमिष निमिष मोहि बिरसत नाहीं, सरद जुहाई राती । पीर हमारी जानत नाहीं, तुम हौ स्याम सँघाती ॥ यह पाती लै जाहु मधुपुरी, जहँ वै बसैं सुजाती । मन जु हमारे उहाँ लै गए, काम कठिन सर घाती ॥ सूरदास प्रभु कहा चहत हैं, कोटिक बात सुहाती । एक बेर मुख बहुरि दिखावहु, रहैं चरन रज-राती ॥9॥

Pada 9

उद्धव ब्रज आगमनभ्रमर गीत