उद्धव ब्रज आगमन

उद्धव संदेश · 13 padas

जबहिं चले ऊधौ मधुबन तैं, गोपिनि मनहिं जनाइ गई । बार-बार अलि लागे स्रवननि, कछु दुख कछु हिय हर्ष भई ॥ जहँ तहँ काग उड़ावन लागी, हरि आवत उड़ि जाहिं नहीं । समाचार कहि जबहिं मनावतिं, उड़ि बैठत सुनि औचकहीं ॥ सखी परस्पर यह कही बातैं, आजु स्याम कै आवत हैं । किधौ सूर कोऊ ब्रज पठयौ, आजु खबरि कै पावत हैं ॥1॥

Pada 1

आजु कोऊ नीकी बात सुनावै । कै मधुबन तैं नंद लाड़लौ, कैऽब दूत कोउ आवै ॥ भौंर एक चहूँदिसि तैं उड़ि-उड़ि, कानन लगि-लगि गावै । उत्तम भाषा ऊँचे चढ़ि-चढ़ि, अंग-अंग सगुनावै ॥ भामिनि एक सखी सौं बिनवै, नैन नीर भरि आवै । सूरदास कोऊ ब्रज ऐसौ, जो ब्रजनाथ मिलावै ॥2॥

Pada 2

तौ तू उड़ि न जाइ रे काग । जौ गुपाल गोकुल कौं आवैं, तो ह्वै है बड़भाग ॥ दधि ओदन भरि दोनौं दैहौं, अरु अंचल कौ पाग । मिलि हौं हृदय सिराइ स्रवन सुनि, मेटि बिरह के दाग ॥ जैसें मातु पिता नहिं जानत, अंतर कौ अनुराग । सूरदास प्रभु करैं कृपा जब, तब तैं देह सुहाग ॥3॥

Pada 3

है कोउ वैसी ही अनुहारि । मधुबन तन तैं आवत सखि री, देखौ नैन निहारि ॥ वैसोइ मुकुट मनोहर कुँडल, पीत बसन रुचिकारि । वैसहिं बात कहत सारथि सौं,ब्रज तन बाँह पसारि ॥ केतिक बीच कियौ हरि अंतर, मनु बीते जुग चारि । सूर सकल आतुर अकुलानी, जैसें मीन बिनु बारि ॥4॥

Pada 4

घर घर इहै सब्द पर्‌यौ । सुनत जसुमति धाइ निकसी, हरष हियौ भर्‌यौ ॥ नंद हरषित चले आगैं, सखा हरसित अंग । झुंड झुंडनि नारि हरषित, चलीं उदधि तरंग ॥ गाइ हरषित ते स्रवतिं थन, चौकरत गौ बाल । उमँगि अंग न मात कोऊ, बिरध तरुनऽरु बाल ॥ कोउ कहत बलराम नाहीं, स्याम रथ पर एक । कोउ कहत प्रभु सूर दोऊ, रचित बात अनेक ॥5॥

Pada 5

कोउ माई आवत है तनु स्याम । वैसे पट बैसिय रथ वैठनि, वैसीयै उर दाम ॥ जो जैसैं तैसैं उठि धाईं, छाँड़ि सकल गृह काम ॥ पुलक रोम गदगद तेहीं छन, सोभित अँग अभिराम ॥ इतने बीच आइ गए ऊधौ, रहीं ठगी सब बाम । सूरदास प्रभु ह्याँ कत आवैं, बँधे कुबिजा रस-दाम ॥6॥

Pada 6

जबहिं कह्यौ ये स्याम नहीं । परीं मुरछि धरनी ब्रजबाला, जो जहँ रही सु तहीं ॥ सपने की रजधानी ह्वै गइ, जो जागीं कछु नाहीं । बार बार रथ ओर निहारहिं, स्याम बिना अकुलाहीं ॥ कहा आइ करिहैं ब्रज मोहन, मिली कूबरी नारी । सूर कहत सब उधौ आए , गईं काम -सर मारी ॥7॥

Pada 7

भली भई हरि सुरति करी । उठौ महरि कुसलात बूझिऐ, आनँद उमँग भरी ॥ भुजा गहे गोपी परबोधति, मानहु सुफल घरी । पाती लिखि कछु स्याम पठायौ, यह सुनि मनहिं ढरी ॥ निकट उपँगसुत आइ तुलाने, मानौ रूप हरी । सूर स्याम कौ सखा यहै री, स्रवननि सुनी परी ॥8॥

Pada 8

निरखत ऊधौ कौं सुख पायौ । सुंदर सुलज सुबंस देखियत, यातैं स्याम पठायौ ॥ नीकैं हरि-संदेस कहैगौ, स्रवन सुनन सुख पैहै । यह जानति हरि तुरत आइहैं, यह कहि हृदै सिरैहै ॥ घेरि लिए रथ पास चहूँधा, नंद गोप ब्रजनारी । महर लिवाइ गए निज मंदिर , हरषित लियौ उतारी ॥ अरघ देत भीतर तिहिं लीन्हौ, धनि धनि दिन कहि आज । धनि धनि सूर उपँगसुत आए , मुदित कहत ब्रजराज ॥9॥

Pada 9

कबहुँ सुधि करत गुपाल हमारी । पूछत पिता नंद ऊधौ सौं, अरु जसुदा महतारी ॥ बहुतै चूक परी अनजानत, कहा अबकैं पछिताने । बासुदेव घर भीतर आए , मैं अहीर करि जाने ॥ पहिलैं गर्ग कह्यौ हुतौ हमसौ, संग दुःख गयौ भूल । सूरदास स्वामी के बिछुरै, राति दिवस भयौ सूल ॥10॥

Pada 10

कह्यौ कान्ह सुनि जसुदा मैया । आवहिंगे दिन चारि पाँच मैं, हम हलधर दोउ भैया । मुरली बेंत बिषान हमारौ, कहूँ अबेर सबेरौ । मति लै जाइ चुराइ राधिका, कछुक खिलौना मेरौ ॥ जा दिन तैं हम तुम सौं बिछरै, काहु न कह्यौ कन्हैया । प्रात न कियौ कलेऊ कबहूँ, साँझ न पय पियौ घैया ॥ कहा कहौं कछु कहत न आवै, जननी जो दुख पायौ । अब हमसौं बसुदेव देवकी, कहत आपनौ जायौ ॥ कहिऐ कहा नंद बाबा सौं, बहुत निठुर मन कीन्हौ । सूर हमहिं पहुँचाइ मधुपुरी, बहुरि न सोधौ लीन्हौ ॥11॥

Pada 11

हमतैं कछु सेवा न भई । धोखैं ही धोखैं जु रहे हम, जाने नाहिं त्रिलोकमई ॥ चरन पकरि कर बिनती करिबौ, सब अपराध क्षमा कीबै । ऐसौ भाग होउगौ कबहूँ, स्याम गोद पुनि मैं लीबै ॥ कहै नंद आगैं ऊधौ के, एक बेर दरसन दीबे । सूरदास स्वामी मिलि अबकैं, सबै दोष निज मन कीबे ॥12॥

Pada 12

ऊधौ कहौ साँची बात । दधि, मह्यौ नवनीत माधव, कौन के घर खात ॥ किन सखा सँग संग लीन्हे, गहे लकुटी हाथ । कौन की गैयाँ चरावत, जात को धौं साथ ॥ कौन गोपी कूल-जमुना, रहत गहि गहि घाट । दान हट कै लेत कापै, रोक किनकी बाट ॥ कौन ग्वालिनि साथ भोजन, करत किनतैं बात ॥ कौन कैं माखन चुरावन, जाति उठिकै प्रात ॥ इतौ बूझत माइ जसुमति, परी मुरछित गात । सूरदास किसोर मिलबहु, मटि हिय की तात ॥13॥

Pada 13

तीन पाती तथा संदेशउद्धव का गोपियों को पाती देना